Kargil Diary

#Kargildiary : पापा मेरे लिए बन्दूक लाएंगे, ऐसे चलाऊंगा

हवलदार अजायब सिंह





सात साल के रविंदर को बन्दूक चाहिए। सबसे पहले वो इसी की फरमाइश करता है। तीन महीने हो गए हैं इन्तजार करते हुए। उसके पापा बन्दूक लाने का वादा करके गए थे। पिता की शहादत के बारे में पूरी बात समझ पाने में अक्षम नटखट रविंदर तुरंत ही अपनी फरमाइश भी बदल देता है। फौज में तोप चलाने वाले अपने मामा पर नजर पड़ते ही तपाक से बोलता है, ‘मुझे बन्दूक नहीं तोप चाहिए।’ कुछ देर तक इन्हीं चीजों की फरमाइश करने के बाद रविंदर दादा की गोद से छिटककर आँगन में जा खेल में मसरूफ हो जाता है।

  • अजायब के बूढ़े पिता ने यह कह तो डाला पर तभी उन्हें हमेशा के लिए बिछड़ गया बेटा याद आ गया। पलकें भीग गईं। अपना जिक्र आते ही नन्हा रविंदर उन तक पहुँच चुका था। बोला, ‘रोते क्यों हो मैं हूँ ना।’

रविंदर को तो बन्दूक खेलने के लिए चाहिए पर उसके पापा तो इन्हीं बंदूकों के साथ जान पर खेल गए। रविंदर के पापा अजायब सिंह 8 सिख रेजिमेंट में हवलदार थे। उसकी यूनिट पठानकोट में थी। दो मई को वह वह रेजिमेंट करगिल के लिए रवाना हुई थी। उसके बाद उसने न पत्र लिखा और न ही परिवार वालों को उसका कोई सन्देश मिला। बस 13 जुलाई को अजायब सिंह बिना कोई खबर दिए आ गया। तिरंगे में लिपटा हुआ। साथ आए यूनिट के जवानों ने अजायब के बारे में जो कुछ बताया वह कोई सच्चा सिपाही ही कर सकता है।

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हवलदार अजायब सिंह का बेटा रविन्द्र सिंह (File photo)

 

21 मई को आतंकवादियों के साथ एक मुकाबले में अजायब को गोली लगी। उसे श्रीनगर स्थित अस्पताल में लाया गया। वहां उसका ऑपरेशन हुआ। जख्म अभी भरा ही था कि वह देशभक्त फिर दुश्मन से मोर्चा लेने के लिए पहुँच गया करगिल क्षेत्र में। पर अपने जख्मी होने की भनक तक उसने घर वालों को नहीं लगने दी।

तीन जुलाई को टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया गया था। वो जगह घुसपैठियों से खाली हो गई थी। अजायब और उसके साथ आधा दर्जन जवान निश्चिंत थे। तीन दिन ठीक-ठाक गुजर गए। जवानों ने वहां अपना कब्ज़ा जमाये रखा। सात जुलाई की सुबह अचानक पाकिस्तानी घुसपैठियों ने हमला बोल दिया। उनकी संख्या करीब 25 रही होगी, पर अपने से दोगुने हमलावरों को भी अजायब और उसके साथियों ने करारा जवाब दिया। उन्होंने दर्जन भर पाकिस्तानी दुश्मन धराशायी कर डाले। शायद औरों को भी कर डालते पर दुर्भाग्य से तब तक गोला-बारूद ख़त्म हो गया था।

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गम के साथ फख्र भी है इस परिवार को… अजायब सिंह की पत्नी (दाएं) एवं माता-पिता व भाई (File photo)

 

अजायब और उसके साथियों ने वीरगति का वरण कर लिया। जिला अमृतसर के जहांगीर गांव में रहने वाला अजायब का परिवार यूँ तो कुम्हार बिरादरी का है पर साहस और वीरता उसके खून में ही बसी हुई थी। यही बात साबित होती है उसके पिता की कथनी से। वह कहते हैं, ‘मैं अपने पोते को भी फौजी बनाऊंगा।’ अजायब के बूढ़े पिता ने यह कह तो डाला पर तभी उन्हें हमेशा के लिए बिछड़ गया बेटा याद आ गया। पलकें भीग गईं। अपना जिक्र आते ही नन्हा रविंदर उन तक पहुँच चुका था। बोला, ‘रोते क्यों हो मैं हूँ ना।’

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