Kargil Diary

#Kargildiary : …वो अंतिम सांस तक फायर करता रहा

जसविंदर सिंह (फाइल फोटो)





बूढ़ी स्वर्ण कौर ने अपने जवान बेटे को तब पिछली बार तब जी भरकर देखा था, जब उसका बेटा सिर पर सेहरा बांध, कमर में तलवार लटकाए सफेद घोड़ी पर सवार हो दुल्हन लाने गया था। स्वर्ण कौर ने तब उसकी खूब बलाएं ली थीं, नजर उतारी थी। दूल्हा बने सजे-संवरे बेटे की तस्वीर अभी भी स्वर्ण कौर की आंखों में है। और हो भी क्यों न। उस सुखद घटना को बीते अभी चार महीने ही तो हुए थे। इसीलिए स्वर्ण कौर को यकीन नहीं हो रहा था कि उसका वही बेटा अब लकड़ी के ताबूत में बंद है वर्दी पहने पर कफन ओढ़े। वो 23 जनवरी 1999 का दिन था और आज 30 मई 1999।

स्वर्ण कौर का पुत्र वह जसविंदर सिंह 8 सिख लाइट इन्फेंटरी का सिपाही था। उसकी कंपनी पठानकोट में तैनात थी। शादी करवाकर जब वह लौटा तो कंपनी टाइगर हिल पर भेज दी गई।

जसविंदर सिंह लाइट इन्फेंटरी की उस कंपनी में था जिस कंपनी को सामरिक रूप से अति महत्वपूर्ण करगिल क्षेत्र में तैनात किया गया था। 21 मई को जसविंदर वाली फौजी टुकड़ी पहाड़ी पर सबसे आगे चढ रही थी कि अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो गई। जसविंदर की दोनों जांघों में गोलियां जा धंसी। गांव वाले बताते हैं कि जसविंदर वहीं गिर गया, लेकिन उसने जवाबी फायर करना तब तक नहीं छोड़ा जब तक उसकी अंतिम सांस साथ देती रही।

जसविंदर सिंह के माता-पिता

सिपाही जसविंदर सिंह के दृष्टिविहीन पिता जोगिंदर सिंह व माता स्वर्ण कौर

नौ दिन बाद शहीद जसविंदर का शव पंजाब के रोपड़ जिला स्थित पैतृक गांव मुन्ने पहुंचा। वहां, पूरे सैनिक सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया। अपने सबसे छोटे बेटे की शहादत पर हुए सम्मान का दृश्य स्वर्ण कौर ने जब देखा, तो उसे खुद पर ही गर्व हुआ था। लेकिन अभागा दृष्टिहीन पिता जोगिंदर सिंह तो इस गर्व का भी पूरा अहसास न कर सका।

यूं तो इस वृद्ध दंपत्ति के चार पुत्र थे। दो पुत्र तो बीमारी में चल बसे। बड़े बेटे सीताराम का विवाह किया। अभी तीन साल भी न बीते थे कि पुत्रवधु अमरीक कौर की मृत्यु हो गई। अमरीक कौर के मायके वालों की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया और सीताराम पर मुकदमा चला। मुकदमे का खर्च झेलने के लिए जोगिंदर सिंह ने अपनी थोड़ी बहुत खेतिहर जमीन में से भी आधी जमीन बेच दी, लेकिन फिर भी बेटे को सजा होने से नहीं बचा सका। सीताराम को दस साल की जेल हो गई। जेल से ढाई साल पहले ही वह छूटा पर रोजगार नहीं रहा। सरकारी नौकरी थी वो भी छूट गई। उस पर दो बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी।

  • सबसे छोटे बेटे की शहादत पर हुए सम्मान का दृश्य स्वर्ण कौर ने जब देखा, तो उसे खुद पर ही गर्व हुआ था। लेकिन अभागा दृष्टिहीन पिता जोगिंदर सिंह तो इस गर्व का भी पूरा अहसास न कर सका।

अब कुल मिलाकर जोगिंदर और स्वर्ण कौर की सारी उम्मीदें जसविंदर सिंह से ही थीं। पर वह भी उनके काम का नहीं लेकिन देश के काम आ गया। यूं तो जोगिंदर सिंह की आंखों की रोशनी आठ वर्ष पहले गई थी, लेकिन उन आंखों ने सुनहले सपने अब तक देखे थे। जोगिंदर सिंह कहता, ‘मुझे तो अब जाकर अपने अंधेपन का अहसास हुआ है। अब तक जसविंदर ने मुझे ये अहसास होने ही नहीं दिया था।’

  • जोगिंदर कहते हैं, ‘अब पैसा बहुत बड़ी चीज हो गया है जी।’

इस बूढ़े दंपत्ति को अपने जवान बेटे के चले जाने का तो गम है ही, उससे भी ज्यादा तकलीफ उन्हें पुत्रवधु के बर्ताव से पहुंची है। जसविंदर की पत्नी गुरदयाल कौर गर्भवती है। जोगिंदर सिंह कहता है, ‘मुझे अफसोस तो इस बात का है कि जब तक सरकार ने आर्थिक मदद नहीं की थी तब तक तो हमारे पास ही रही लेकिन जिस दिन पैसा मिल गया उसके फौरन बाद मायके चली गई।‘ जोगिंदर कहते हैं, ‘अब पैसा बहुत बड़ी चीज हो गया है जी।’

स्वर्ण कौर चाहती है कि गर्भवती पुत्रवधु उनके साथ ही गांव में रहे। वह चाहती हैं कि पुत्रवधु वहीं संतान को जन्म दे। वह कहती हैं ‘असी ते चाहंदे हां, बहू साडे कोल ही आ जाए, हौर कुज नहीं ते पुत्त दी निशानी ते साडे नाल रहेगी।‘

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