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भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B वीज़ा में अड़चनें 

भारतीय छात्र
प्रतीकात्मक फोटो

लॉस एंजेल्स से ललितमोहन बंसल   

 अमेरिका में बेहतर भविष्य के लिए एच-1बी वीज़ा की राह में भारतीय तकनीकी पेशेवर  प्रार्थियों को नई अड़चनें झेलनी पड़ सकती हैं। इसके लिए ट्रम्प प्रशासन के एक ताज़ा फ़ैसले के अनुसार अगली 1  अप्रैल से आवेदन जमा कराने वालों को नई प्रणाली के अन्तर्गत ऑन लाइन आवेदन जमा कराना होगा। इस नियम के अंतर्गत प्राथमिकता उन्हीं प्रार्थियों को दी जाएगी जो अमेरिका में रह कर स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करते हैं। सन् 1990 की संवैधानिक मर्यादानुसार अभी तक एच-1बी वीज़ा के लिए स्नातक डिग्री धारक आवेदन करते रहे हैं और आगे भी कर सकेंगे। इस श्रेणी में तीन-तीन वर्ष के अस्थाई वीज़ा–एच-1बी में निर्धारित 65 हज़ार वीज़ा के लिए 1 अप्रैल से इतनी मारा मारी होती है कि पहले 07 से 10 दिनों में डेढ़ से दो लाख आवेदन जमा हो जाते हैं। अमेरिका की यू एस सिटीजेन एंड इमिग्रेशन सर्विसेज़ (यूएससीआईएस) के नए निर्देशानुसार हार्ड कापी के लिए मनाही नहीं है। प्राथमिकता ऑन लाइन जमा कराने वाले प्रार्थियों को मिलेगी। बता दें कि अमेरिका में रह कर स्नातकोत्तर डिग्रीधारकों के लिए अलग से 20,000 एच-1बी वीज़ा निर्धारित हैं। यह तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव अभियान में अपने वादों की सूची में ‘बाय अमेरिका, हायर अमेरिका’ के तहत एच-1बी वीज़ा के तहत अमेरिका में रह कर स्नातकोत्तर डिग्री धारकों को प्राथमिकता दिए जाने की बात की थी।





ट्रम्प का दृढ़ मत रहा है, उन्हें डाटा आप्रेटर नहीं,  उच्चशिक्षित टेक प्रार्थी चाहिए। उन्होंने इसके दो लाभ गिनाए थे। पहला यह कि अमेरिकी नियोक्ताओं को उच्चशिक्षित टेक प्रार्थी मिलेंगे। दूसरा अमेरिकी स्नातक युवाओं को रोज़गार मिल सकेगा। ट्रम्प प्रशासन ने अपने एच-1बी वीज़ा नियमों में सुधार किया। अमेरिकी संस्थानों से स्नातकोत्तर डिग्री धारकों के लिए जॉब कोटे में 16 प्रतिशत अर्थात 5,340 कर्मियों की वृद्धि कर दी। इस पर लोगों की आम राय के लिए एक माह का समय दिया गया। एक नई अड़चन यह सामने आई कि होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट ने अमेरिकी कंपनियों को एच -1बी वीज़ा के लिए समय पूर्व याचिका दिए जाने की हिदायत दी कि वे अमेरिकी शिक्षण संस्थानों से स्नातकोत्तर डिग्री हासिल प्रार्थियों को प्राथमिकता कैसे जुटा सकते हैं।

विदित हो कि अभी तक एच-1बी अस्थाई वीज़ा कार्यक्रम के अंतर्गत 70 प्रतिशत प्रार्थी भारतीय कंपनियों के माध्यम से आते रहे हैं। इनमें ज़्यादातर प्रार्थी भारत की चार आउट सोर्सिंग कंपनियों- टाटा कन्सल्टेंसी सर्विस, इंफ़ोसिस, विप्रो और HCL के होते हैं। इन नई अड़चनों से दिक्कत यह है कि इन चारों कंपनियों को भुगतना पड़ सकता है जो एच -1बी के दोषों का लाभ उठाती आई है।

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