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फुरसत में: इस फौजी ने लिखे फिल्मों के लिए चार हजार गाने, जानें 10 खास बातें 

आनंद बख्शी

उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि फिल्मों में काम करना है। पहुंच गये मुंबई। नौसेना में भर्ती हो गए। कुछ वर्ष वहां काम किया। फिल्मों में काम करने की छटपटाहट ने नौसेना की नौकरी छुड़वा दी। पर फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं था। वह फिर सेना में भर्ती हो गए। पर फिल्मी परदा उन्हें खींचता रहा। पचास के दशक के उतरार्ध में उनकी मुलाकात अपने जमाने के लोकप्रिय अभिनेता भगवान दादा से हुई। भगवान दादा ने अपनी फिल्म ‘भला आदमी’ के कुछ गीत लिखवाए। शुरुआत हो चुकी थी, काम भी मिल रहा था लेकिन सफलता मिलनी शेष थी। उनके लिखे गीतों से सजी एक दर्जन से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं। आया बरस 1965। उनकी दो फिल्में प्रदर्शित हुईं ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब-जब फुल खिले’। दोनों ही फिल्मों के गीत गली-गली गूंजने लगे। लोग पूछने लगे कि किस शख्स ने सीधे-सरल शब्दों में इतनी गहराई वाले गीत लिखे हैं। पता चला नाम है आनंद बख्शी जो पहले सेना और नौसेना में भी काम कर चुके हैं। चांद सी महबूबा हो मेरी…, कंकरिया मार के जगाया…, एक था गुल और एक थी बुलबुल…, परदेसियों से न अंखियां मिलाना…, यहां मैं अजनबी हूं… सरीखे गीतों से आनंद बख्शी के नाम का डंका जो बजा वह लगभग चार दशक तक बजता रहा। आज हम आपको आनंद बख्शी के बारे में कुछ खास बातें बता रहे हैं-





रावलपिंडी में हुआ जन्म

गीतकार आनंद बख्शी

आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी में हुआ। छोटी सी उम्र में ही फिल्मी परदे के आकर्षण से ऐसे बंधे कि चालीस के दशक में किशोर उम्र में बंबई का रास्ता पकड़ लिया। पहले नौसेना और फिर सेना में काम किया। इच्छा यही थी कि फिल्मों के लिए गीत लिखूं और गाऊं भी। पचास के दशक के आखिर में उन्हें पहला काम मिला। मौका दिया उस जमाने के लोकप्रिय अभिनेता और निर्देशक मास्टर भगवान (भगवान दादा) ने। जी हां वही भगवान जिन्हें उनके डांसिंग स्टेप के लिए आज भी याद किया जाता है। कई बड़े अभिनेताओं ने भगवान की नृत्य शैली की नकल की और कामयाब हुए। खैर भगवान दादा ने आनंद बख्शी से ‘भला आदमी’ के कुछ गीत लिखवाए।

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