Anya Smachar

हड्डियां टूटती रहीं…इरादे मजबूत होते रहे, क्रैक की सिविल सर्विस परीक्षा

उम्मुल खेर

नई दिल्ली। जिंदगी भर खुशियों से महरूम रही उम्मुल खेर ने सारी मुश्किलों को धता बताते हुए सिविल सेवा परीक्षा पास कर अपने नाम को सही मायनों में पारिभाषित किया है। 28 वर्ष की उम्र तक उन्हें 16 फ्रैक्चर हुए हैं और वह आठ बार सर्जरी करा चुकी हैं, लेकिन बुधवार को सिविल सेवा के नतीजे में उम्मुल ने 420वीं रैंक हासिल कर हर मुश्किल को परास्त कर दिया है। उनके नाम का मतलब होता है खुशियां, लेकिन कामयाबी की जिन खुशियों ने उन्हें गले लगाया है उनका सफर बेहद कांटों भरा था।





बोन डिसआॅर्डर से हैं पीड़ित, अचानक टूट जाती हैं शरीर की हड्डियां

28 वर्ष की उम्र तक आते आते उसकी कई हड्डियां टूटीं, कई सर्जरी हुईं। रेअर डिसआॅर्डर और उस पर मुफलिसी की मार, इस शारीरिक दुर्बलता और घने खर्चे के चलते अपनों ने भी उससे मुंह मोड़ लिया, लेकिन जब जिंदगी के सफर में आप अकेले पड़ जाएं, तो काम आते हैं बुलंद हौसले। ऐसे ही हौसलों का नाम है उम्मुल खेर। उम्मुल आॅस्टियो जेनेसिस नाम के बॉडी डिसआॅर्डर से पीड़ित हैं। इस बीमारी के चलते हड्डियां अचानक टूटने लगती हैं।

अम्मुल खेर

ग्रेजुएशन के दौरान उम्मुल ने साउथ कोरिया में डिसेबल लोगों के एक कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

मुश्किल बीमारी और अकेली मां उस पर मुफलिसी भी

अपनी कामयाबी की कहानी बयां करते हुए राजस्थान के पाली मारवाड़ की उम्मुल खेर बताती हैं कि मेरी उम्र पांच वर्ष थी। हम तीन भाई-बहन थे। परिवार में गरीबी थी। पिता मां को छोड़कर काम की तलाश में दिल्ली आ गए, उनके जाने के बाद मां को सीजोफ्रेनिया नामक बीमारी ने घेर लिया। फिर भी वह एक नौकरी कर हमें पालती थीं। बीमारी के कारण ये नौकरी भी छूट गई। दिल्ली में फेरी लगाकर और कपड़े बेचकर कमाने वाले पिता हमें दिल्ली ले आए और हम सभी हजरत निजामुद्दीन के पास झुग्गी झोपड़ी में रहने लगे। 2001 में यहां से झोंपड़ियां उजाड़ दी गर्इं और हमारे पास फिर से रहने के लिए छत नहीं बची। हम फिर त्रिलोकपुरी इलाके की झुग्गियों में जाकर बस गए। सौतेली मां भी साथ रहती थी। हालात पढ़ने लायक तो बिल्कुल नहीं थे।

अम्मुल खेर

वर्ष 2014 से वर्तमान में वह डस्किन लीडरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं।

आगे पढ़ने की बात की तो मां बाप नही मानें, मैंने घर छोड़ दिया

‘मुझे पं0 दीनदयाल उपाध्याय इंस्टीट्यूट फॉर फिजिकल हैंडिकेप्ड में दाखिल किया गया, जहां मैं पांचवीं क्लास तक पढ़ी।’ उम्मुल कहती है कि मुझे याद है कि तब तक मेरी कई हड्डियां टूट चुकी थीं, बाद में पिता ने स्पेशल स्कूल अमर ज्योति कड़कड़डूमा में भर्ती करा दिया, यहां स्कूल की टीचर को एक नेशनल चैरिटी ट्रस्ट की मदद मिली, जिसके तहत मेरा दाखिला अर्वाचीन स्कूल में हो जाता और मुझे स्कॉलरशिप मिल जाती, लेकिन घरवाले इसके लिए राजी नहीं थे। मुझे कहा गया कि यदि मैंने आगे पढ़ाई की, तो घर वाले मुझसे संबंध तोड़ देंगे। मैंने सवाल उठाए, क्योंकि मैं आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन मेरे साथ बुरा बर्ताव किया गया। स्कूल में एडमिशन लिया और यहां भी मैंने दसवीं में कला वर्ग से 91 प्रतिशत के साथ टॉप किया।’

अम्मुल खेर

वर्तमान में जेएनयू से ही इंटरनेशनल स्टडीज पर शोध कर रही हैं

सुना था सबसे कठिन परीक्षा होती है IAS

उम्मुल की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इधर एक होनहार लड़की की प्रतिभाएं निखर रहीं थी, उधर घर के हालात और बिगड़ने लगे। मां बाप का कहना था कि उसे एक लड़की होते हुए भी ज्यादा एजुकेशन मिल गई है, लेकिन वह आगे पढ़ना चाहती थी। सो उसने घर छोड़ने का फैसला किया और एक अलग झुग्गी में रहने लगी। वह कहती है ‘मैं झुग्गी के बच्चों को पढ़ाकर सौ-दो सौ रुपये कमा लेती थी और डिबेट में मिले पुरस्कार राशि को जमा कर खर्च चलाती थी। बस उस दौरान ही आईएएस बनने का ख्याल आया। तब सुना था… ये सबसे कठिन परीक्षा होती है।’

अम्मुल खेर

जापान में भी दिव्यांगों और शारीरिक दुर्बलताओं से जूझ रहे लोगों के लिए वह भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

लड़की थी, झुग्गी में रहना भयानक था, लेकिन नहीं था कोई विकल्प

उम्मुल बताती है, एक लड़की के लिए झुग्गी में अकेले रहना कई बार दर्दनाक होता है लेकिन मेरे पास कोई आॅप्शन नहीं था। वह कक्षा बारह में भी सबसे आगे रहीं। कॉलेज जाने की बारी आई तो हड्डियां टूटने का डर सताने लगा। फिर भी डीटीसी बसों में यात्राएं की और दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लिया, यहां तक आते-आते वह अपने बोन डिसआॅर्डर के चलते एक साल तक व्हीलचेयर पर रहीं। अपनी कहानी को विराम देकर उम्मुल हंसते हुए कहती हैं कि परिणाम आपके सामने है और सफर अभी जारी है। घर वाले बहुत खुश हैं।

क्या घरवालों को कभी माफ कर पाएंगी?

घर वालों को उनकी गलती के लिए क्या वह उन्हें माफ करेंगी, इस पर उम्मुल कहती हैं कि इसमें उनकी गलती नहीं थी, वे ऐसे ही माहौल में रचे बसे हैं जिसने उनकी सोच को सीमित कर दिया है, वे आज भी शायद ही जानते हों कि सिविल सर्विसेज का मतलब क्या होता है। उनके पिता वापस राजस्थान चले गए हैं और उनका एक भाई चूड़ियों की दुकान चलाता है।

अम्मुल खेर

वर्ष 2014 से वर्तमान में वह डस्किन लीडरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं। इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाली वह तीसरी भारतीय महिला हैं।

स्कूल और शिक्षा

वर्ष 2004 से 2008 अर्वाचीन भवन सीनियर सेकेंड्री स्कूल से 10वीं, 12वीं की पढ़ाई के बाद 2010 से डीयू से एप्लाइड मनोविज्ञान से स्नातक किया तथा 2013 में जेएनयू से पॉलिटिक्स व इंटरनेशनल रिलेशंस में स्पेशलाइजेशन विषय से परास्नातक पूरा कर इंटरेनेशनल स्टडीज विषय से एमफिल भी कर चुकी हैं। उम्मुल वर्तमान में जेएनयू से ही इंटरनेशनल स्टडीज पर शोध कर रही हैं।

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