Anya Smachar

तीन तलाक मामला संवैधानिक पीठ के सुपुर्द

सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल (तीन) तलाक के मसले को संवैधानिक बेंच को सौंप दिया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि 11 मई से इस मामले की सुनवाई संवैधानिक बेंच करेगी।





सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और कपिल सिब्बल ने सुनवाई की तिथि ग्रीष्मावकाश में होने पर आपत्ति जताई लेकिन चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर हम ग्रीष्मावकाश में नहीं बैठेंगे तो इसका हल कभी नहीं निकलेगा। उन्होंने कहा कि हमने नेशनल ज्युडिशियल अकाउंटेबिलिटी कमीशन पर ग्रीष्मावकाश में ही सुनवाई की थी तो इस पर क्यों नहीं हो सकता है?

आपको बता दें कि 27 मार्च को ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड ने अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करते हुए दायर याचिकाओं का विरोध किया था। बोर्ड ने कहा था कि ट्रिपल तलाक के बारे में कोई भी आदेश किसी धर्म को अपनाने और उसको मानने के उसके अधिकारों का उल्लंघन करेगा।

इसके पहले 16 फरवरी को ट्रिपल तलाक के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को निर्देश दिया था कि वे अटार्नी जनरल को अपने मसले लिखित रूप से तीस मार्च तक दे दें। कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए थे कि इस मसले को पांच जजों की संविधान बेंच के समक्ष रेफर किया जा सकता है।

केंद्र सरकार के भेजे ये चार मसले जिन पर सुनवाई होनी है

  • ये कि क्या तलाक, निकाह और बहु-विवाह संविधान की धारा 25(1) के तहत सुरक्षित है
  • क्या संविधान की धारा 25(1) संविधान के खंड तीन खासकर धारा 14 और 21 का विषय है
  • क्या संविधान की धारा 13 के तहत पर्सनल लॉ वैध है
  • क्या तलाक, निकाह और बहु विवाह अंतर्राष्ट्रीय संधि का पालन करता है जिसका एक हस्ताक्षरकर्ता भारत भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षकारों से कहा था कि वे पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से बहस के लिए तीन तीन वकीलों या पक्षकारों का चयन कर लें। वे क़ानून के व्यापक मुद्दे पर विचार करेंगे। कोर्ट ने कहा था कि इसमें मानवाधिकार का पहलू भी शामिल हो सकता है और उसका लंबित मामलों पर भी असर हो सकता है। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में वह कामन सिविल कोड पर विचार नहीं कर रहे हैं।

उसके पहले सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक और हलफनामा दाखिल कर केंद्र की दलीलों का विरोध किया था। बोर्ड ने कहा था कि ट्रिपल तलाक को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले केंद्र सरकार का रुख गलत है। पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकार के रूप में चुनौती नहीं दी जा सकती है। उनके मुताबिक ट्रिपल तलाक, निकाह जैसे मुद्दे पर कोर्ट अगर सुनवाई करता है तो ये जूडिशियल लेजिस्लेशन की तरह होगा।

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