Aapni Baat

महिलाओं के लिए जगह तो बनाओ !

चार साल होने को आये हैं इस बात को सुनते सुनते…। अबकी बार फिर गृहमंत्री ने संसद में दोहराया- पुलिस और अर्धसैनिक बलों में 33 फीसदी ओहदों पर महिलाएं होनी चाहिए। पहले तो यही तर्क समझ नहीं आता कि 33% ही क्यों? 50% क्यों नहीं जबकि इन्हें आधी आबादी माना जाता है! शायद संसदीय व्यवस्था के प्रभाव में ये फीसद हावी रहता होगा। वैसे बरसों से तो उस व्यवस्था में भी 33 फीसदी आरक्षण नहीं कर पाए।





उस हिसाब से ही अगर देखा जाए तो बात तो ठीक है। अच्छी भी है बराबरी के सिद्धांत के हिसाब से और बड़ी भी है क्योंकि अभी हमारे पुलिस संगठनों में इनकी नफरी 6% से ज्यादा नहीं है। चार साल से सब इसे बढ़ाने का, और जरूरत का भी, गाना तो गा रहे हैं लेकिन इस दिशा में जमीनी काम की असलियत सिफर से थोड़ी ही बेहतर हुई होगी। वैसे भारत की पुलिस व्यवस्था में तो महिलाओं को अहमियत देने का कोई इतिहास है ही नहीं। ये तो कानून की मजबूरी के चक्कर में महिलाओं को पुलिस फोर्स में शामिल किया गया। मोटी मोटी तोंदें ही कानूनी जरूरतें- एक, महिला आरोपियों से निबटने में महिला पुलिस की उपलब्धता की बाध्यता और दूसरा, महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों, खासतौर से छेड़छाड़। बलात्कार जैसे केस में जांच के लिए महिला पुलिसकर्मी का प्रावधान।

बुलेट प्रूफ जैकेट में महिलाकर्मी (प्रतीकात्मक फोटो)

बुलेट प्रूफ जैकेट में महिलाकर्मियों की परेशानी (प्रतीकात्मक फोटो)

हैरानी, परेशानी और अफसोस होता है ये सुनकर कि कई महिला पुलिसकर्मी घंटों घंटों तक फील्ड ड्यूटी में इसलिए प्यासी रहती हैं कि कहीं उन्हें मूत्र त्याग की जरूरत न आन पड़े। क्योंकि उनकी इस प्राकृतिक जरूरत को पूरा करने के लिए टॉयलेट तक उपलब्ध नहीं होते। कुछ मेट्रो को छोड़ दें तो हमारी पुलिस और अर्द्धसैनिक बल ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर जिन ट्रकनुमा वाहनों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें सवारी करने में तो वे तब खौफ खाती हैं जब मासिक धर्म या गर्भ की अवस्था हो। मौजूदा व्यवस्था तो कई बार उनको निजता की इतनी सुविधा भी नहीं देती कि थाने में लंबी ड्यूटी में वो आराम करना चाहें या अपने अंडर गारमेंट्स भी सुखाना चाहें तो कोई सुरक्षित जगह मिल जाए। महिलाओं के स्वागत के लिए खाकी धारी संगठन कितने तैयार हैं, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि महिलाओं को वही वर्दी और साजो-सामान धारण करना पड़ता है जो पुरुषों के लिए बना होता है। आज भी वे पुरुषों के लिए बनी वही भारी भरकम बुलेटप्रूफ जैकेट पहनती हैं, जो स्वाभाविक है ज्यादा टाइट होंगी। वो दमघोंटू बन जाती हैं। जूते और टोपी भी मरदाना साइज के। …और तो और डांगरी भी वैसी ही। यूनिफार्म के साथ क्रास बेल्ट भी वही पुरुषों वाली जो महिलाओं के लिए टॉयलेट में और असुविधा पैदा करती है।

महिला दस्तों का देर रात ड्यूटी पर रूकना अहम मसला (प्रतीकात्मक फोटो)

अभी जितनी तादाद में महिलाएं अर्द्ध सैन्य बलों या पुलिस में हैं भी तो उनमें से ज्यादातर सिपाही, हवलदार या ज्यादा से ज्यादा सब इंस्पेक्टर स्तर पर हैं। अधिकारी तो बहुत ही कम। एक वजह और भी है… वो यह कि भारतीय परिवेश में खासतौर से परिवार की जिम्मेदारी। अगर बच्चे छोटे हैं तो महिलाएं ड्यूटी के दौरान उन्हें कहां छोड़ें ? थाने या पुलिस दफ्तर में ऐसा कोई इंतजाम तो है ही नहीं। इक्का-दुक्का जगह ही ऐसी जरूरत पूरा करने के लिए क्रेच या डे केयर सेंटर हैं।

ये हालात ही वे वजह हैं कि बहुत सी महिलाएं पुलिस में डेस्क जॉब या ऐसा काम करना चाहती हैं जिसमें उनको देर रात तक न रुकना पड़े। वो इसलिए भी फील्ड में नहीं जातीं कि रात देर तक काम करना पड़ा तो घर तक पहुंचाने की ढंग की व्यवस्था भी पुलिस सिस्टम नहीं कर पाएगा।

अर्ध सैनिक बलों में तो उनके हालात और भी बदतर हैं। वहां लगातार कई दिनों और महीनों तक घर से दूर तैनाती रहती है। शादी होने के बाद तो और भी मुश्किल।

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