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J&K : एक नजरिए से बात नहीं बनेगी

संजय वोहरा (प्रधान संपादक)

दून की घाटी से श्रीनगर की घाटी के लिए आतंक की आग में ठंडी हवा के झोंके सी एक खबर आई। इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से इस बार पास होने वाले नौजवानों के हंसते-खिलखिलाते चेहरों में 11 वो भी थे जिनका ताल्लुक धरती की इस जन्नत से है। इसमें कोई शक नहीं कि सेना की भर्ती रैली में कश्मीरी जवानों की बड़ी तादाद में मौजूदगी हो या अफसर बन के सेना की सेवा करने का जज्बा, उन आतंकवादियों के मुंह पर करारा तमाचा है जो कश्ममीर की फिजां में खून की नदियों और लाशों से खौफ का जहर घोल रहे हैं।





कश्मीरी नौजवानों का ये रुझान रोजगार के नजरिए से भी अच्छा है और देश के सबसे अलग छोर पर बसे प्रांत को बाकी हिस्से से जोड़े रखने के विचार से भी बेहतरीन है। अच्छी बात ये भी है कि इन नौजवानों ने कश्मीर में रहकर आतंकवाद से लोहा लेने की इच्छा जाहिर की है। अपने सीनियर साथी उमर फैयाज का शोपियां में मारा जाना (कायराना तरीके से) इनके हौसले को कम तो खैर क्या करता लेकिन बढ़ और गया है। सबसे अच्छी बात तो ये भी है कि हिन्दू मुसलमान की देशभक्ति पर फर्क करने वाले सियासतदानों और कट्टरपंथियों को भी ये घटना सबक सिखा रही है (अगर वो सीख सकें)।

  • कश्मीर उस मुकुट के समान और उतना ही संवेदनशील है जिसे सुरक्षित अपने साथ बचाकर रखने के लिए भारत रूपी जिस्म के बाकी अंगों ने भी कुरबानियां दी हैं। एक बार नहीं बार-बार। देश के कोने-कोने से यहां इसकी रक्षा के लिए आए तैनात जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिए हैं। जवान बेटों की मांओं की कोख उजड़ी है, नन्हे मुन्नों ने पिता के साये खोए हैं और देश की जवान बेटियों की मांग सूनी हुई है। दो-चार सौ नहीं ऐसे हजारों परिवार इस देश के हर हिस्से में मिल जाएंगे जिनका सब कुछ कश्मीर की खातिर उलट पुलट गया है।

बरसों बीत गए ऐसे हालात देखते देखते। करगिल को ही लें तो दो दशक तो उसे ही पूरे होने को आए हैं। बीच में, कुछ-कुछ सुधरे हालात एक झटके में फिर भयानक हो गए…होते जा रहे हैं लेकिन क्या सिर्फ वहां के नौजवानों का वर्दी पहनना, उस हिस्से को भारत के बाकी अंगों से जोड़े रखने के हिसाब से काफी है। जरूरत और जुड़ाव की भी है। जरूरत इस बात की भी है कि चिनाब के पानी को खारा कर रहे आतंक को दूर किया जाए। चिनाब में यमुना, गंगा, नर्मदा और कावेरी को भी पहुंचाया जाए।

कुल मिलाकर देश के या किसी प्रांत के एक हिस्से को दूसरों से जोड़े रखने के लिए जरूरी ये भी है कि उस हिस्से में दूसरों की भागीदारी बढ़ाई जाए ताकि अपनेपन के अहसास में इजाफा हो। जम्मू-कश्मीर को इसके लिए खुद को तैयार करना होगा। अगर राज्य आतंक के खारे पानी के असर को दूर करके उसमें दूसरे राज्यों में बहती नदियों का मीठा पानी मिलाना चाहता है उसे इसके अवरोध हटाने होंगे। सिर्फ रक्षा और सुरक्षा के स्तर पर भागीदारी से बात नहीं बनेगी। कुछ और क्षेत्रों में भी बाकी राज्यों के बाशिंदों का खैर मकदम करना होगा।

  • कुल मिलाकर धारा- 370 को पूरा नहीं हटाया जा सकता तो इसके कुछ प्रावधानों में नरमाई लानी होगी।

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