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भारत-अमेरिका के बीच ‘टू प्लस टू’ वार्ता से क्षेत्र में भारत का क़द बढ़ेगा !

Nirmala-Sitharaman

वाशिंगटन से ललित मोहन बंसल…

भारतअमेरिका के बीच दिल्ली में सितंबर को होने वाली टू प्लस टू मंत्री स्तरीय वार्ता दोनों देशों की सामरिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग आदि रिश्तों को सुदृढ़ किए जाने की दृष्टि से दिशा निर्धारण में महत्वपूर्ण होगी हीइससे क्षेत्र में भारत का क़द बढ़ेगा। इस उच्च स्तरीय वार्ता में हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत को साझीदार बनाए जाने और इससे भी आगे चीन के बढ़ते प्रभाव के मद्देनज़र दोनों देशों के सामरिक हितों पर बात तो होगी हीपाकिस्तान में नई सरकार के गठन और चीनपाकिस्तान गलियारे से उसकी इकानमी पर बढ़ते दबावअफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के तालिबान से शांति प्रस्ताव को लेकर बिंदुओं पर भी चर्चा होना लाज़िमी है। यू एस मीडिया की माने तो अमेरिका भारतरूस के दशकों पुराने हथियारों के रिश्तों को नई दिशा देने और उन्हें विकसित करने के मूड में है।





इस वार्ता में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सेतुरमन तथा अमेरिका से विदेश मंत्री माइक पोंपियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस भाग लेंगे। इस वार्ता का फैसला प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के गत 25 जून की अमेरिकी यात्रा के दौरान हुई थी। यह वार्ता पहले अप्रैल में होनी थी। विदेश मंत्री टेक्स टिलरसन के अपदस्थ किए जाने और फिर माइक पोंपियो के अकस्मात् उत्तरी कोरिया जाने के कारण वार्ता को स्थगित करना पड़ा था। इस पर पोंपियो ने ख़ुद फ़ोन कर सुषमा स्वराज सफ़ाई दी थी और दिल्ली में ही वार्ता का सुझाव दिया था।

पाकिस्तान में नई सरकार के गठन के बाद होने वाली इस बैठक से पहले एक अच्छा संकेत यह आ रहा है कि अमेरिका के कड़े रूख के बाद आई एम एफ ने क़रीब नब्बे अरब डालर के बाकाया ऋण में आठ से दस अरब डालर की अदायगी के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। आई एम एफ में मध्य एशिया और प्रशांत क्षेत्र के निदेशक और लेबनान के पूर्व वित्त मंत्री ने इस दिशा में नई सरकार से ऋण अदायगी के मामले में सीधे प्रधान मंत्री से बातचीत करने के संकेत दिए है। पाकिस्तान ने पिछले दिनों करंट अकाउंट में रिज़र्व फ़ंड की कमी के कारण चीन से कमर्शियल ब्याज दरों पर एक अरब डालर का क़र्ज़ लिया हैजबकि उसे पाकिस्तानचीन गलियारे के लिए 62 अरब डालर की ऋण अदायगी के रूप में दो साल बाद साढ़े तीन से चार अरब डालर की मय ब्याज अदायगी करना ज़रूरी होगा। अभी तक तीन सौ अरब डालर की जी डी पी के बलबूते पर टिकी पाकिस्तान सरकार को अमेरिका की आर्थिक और मिलिट्री सहायता पर भरोसा था। अमेरिका पिछले सालों में पाकिस्तान को 65 अरब डालर की आर्थिक सहायता दे चुका हैजबकि चीन का पल्ला पकड़ने के बाद उसकी माली हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। नई सरकार के सम्मुख अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक सहायता और आतंकवाद के ख़िलाफ़ साझी लड़ाई में मिलने वाली मिलिट्री मदद पर रोक से आने वाले वर्षों में क्या फ़र्क़ पड़ेगादेखना शेष है। अमेरिका ने गत जनवरी में 1.3 अरब डालर की आर्थिक मदद रोकी है।

अफ़ग़ानिस्तान में हिंसात्मक घटनाओं में लगातार वृधि और तालिबान से शांति प्रस्ताव को लेकर अमेरिका के रूख में आए बदलाव से भारत में चिंताएँ बढ़ी हैंतो रूस और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर भारत के दीर्घकालिक सामरिक हितों को चोट पहुँच रही है। भारत चाहबहार बंदरगाह के रास्ते ईरान से अफ़ग़ानिस्तान और सेंट्रल एशिया में अपने कारोबार को लेकर चिंतित है। अफ़ग़ानिस्तान के साथ भारत ने सामरिक हितों को ध्यान में रखते हुए इंफ़्रास्ट्रक्चरशिक्षा और हेल्थ में दो अरब डालर निवेश किए हैं। अमेरिका भी बख़ूबी यह जानता है कि पाकिस्तानी सेना के अफ़ग़ान तालिबान और हक्कानी गुट से संबंधों और अल क़ायदा तथा जैश ए मुहम्मद आदि आतंकी गुटों के अफ़ग़ान और भारतीय सीमा पर आए दिन की वारदातों के स्थायी समाधान के बिना पीछा छुड़ा नहीं सकता।

हिंद महासागर प्रशांत क्षेत्र में भारत को साझीदार बनाए जाने के लिए क्षेत्र में शांति और स्थिरता का मुद्दा विचारणीय रहेगा। बेशकगत 20 जनवरी को अमेरिकी सुरक्षा रणनीति के तहत भारत को एक बड़ा रक्षा साझीदार बनाया गया हैलेकिन इस संदर्भ में भारत की भूमिका को समझना ज़रूरी है। अमेरिका से रक्षा साज सामान हासिल करना और अमेरिकी क़ायदे क़ानून की शर्तों को स्वीकार करनाएक अन्य मुख्य मुद्दा हैजो अड़चन पैदा कर सकता है। फिर कामकोसा क़ानून के तहत अमेरिका को भारत औचक निरीक्षण की अनुमति देगाबड़ा प्रश्न होगा। सीनेट सशस्त्र मामलों की समिति के सम्मुख रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने पिछले दिनों कांग्रेस के दोनों सदनों के सदस्यों के सामने भारत की वकालत करते हुए कहा था कि अगर हम रक्षा सौदों में कोई अड़चन लगाते हैंतो इसका नुक़सान अमेरिका को होगा। इसके लिए उन्होंने सहयोगी देशों को हथियारों की बिक्री में तेज़ी लाने और सशस्त्र ड्रोन वर्जन सहित हथियारों की आपूर्ति सुगम बनाए जाने पर ज़ोर दिया था। बदलती परिस्थितियों में भारत के लिए निस्सन्देह यह अच्छा मौक़ा है कि ‘’काउंटरिंग अमेरिकन एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शन एक्ट’(कैटसा )  के बावजूद भारत को रूस के साथ रक्षा साज सामान में लें देन करता रहे। लेकिन इस एक्ट की पेचीदगियों को समझना ज़रूरी होगा।

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