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भारत के लिए श्रीलंका ने चीन को दिया बड़ा झटका

श्रीलंका का चीन को झटका

श्रीलंका सरकार ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला किया है। इसके अनुसार चीनी नौसेना अब हम्बनटोटा बंदरगाह का इस्तेमाल नहीं कर सकेगी। सन 2012 में बने इस कारोबारी बंदरगाह की कुछ शर्तों को लेकर एक अर्से से विवाद चल रहा था। भारत सरकार ने इसे लेकर श्रीलंका सरकार को अपनी चिंताओं से अवगत कराया था। चीन की मदद से डेढ़ अरब डॉलर की लागत से बने इस बंदरगाह की 80 फीसदी मिल्कियत चीनी कंपनी के पास है। श्रीलंका की कैबिनेट ने मंगलवार को अब चीन के साथ संशोधित समझौते की रूपरेखा बनाई है, जिसके अनुसार अब चीन की भूमिका केवल बंदरगाह के व्यावसायिक संचालन तक सीमित रहेगी। सुरक्षा की जिम्मेदारी अब श्रीलंका की होगी।





श्रीलंका के बंदरगाहों पर अब नहीं रुक पाएंगे चीनी युद्धपोत

चाइनीज-युद्धपोत

चाइनीज युद्धपोत (फाइल फोटो)

हालांकि नए समझौते का विवरण सार्वजनिक रूप से जारी नहीं हुआ है, पर समाचार एजेंसी रायटर्स का कहना है कि इसके अंश उसे देखने को मिले हैं। अब इस पोर्ट के संचालन के लिए दो कंपनियाँ बनाई जा रही हैं। इस बंदरगाह की सुरक्षा को लेकर केवल भारत ने ही नहीं, जापान और अमेरिका ने भी अपनी चिंता जताई थी। इन देशों का अंदेशा था कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल चीनी नौसेना करेगी। श्रीलंका के बंदरगाहों के प्रबंधन मंत्री महिंदा समरसिंघे ने कहा, ‘हमने चीन को बता दिया है कि हम इस बंदरगाह का सैनिक इस्तेमाल नहीं होने देंगे और इसकी 100 फीसदी सुरक्षा का काम श्रीलंका सरकार देखेगी।’

2014 में चीनी पनडुब्बी ने श्रीलंका में डाला था लंगर

चीनी पनडुब्बी

चीनी पनडुब्बी (फाइल फोटो)

श्रीलंका सरकार ने समझौते के प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया है। अब संसद से इसे मंजूरी की जरूरत होगी। समझौते में इस भारी बदलाव के पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपला सिरिसेना ने समरसिंघे को यह काम सौंपा था। सन 2014 में भारत सरकार ने श्रीलंका से इस बात की शिकायत की थी कि चीनी पनडुब्बी ने कोलम्बो में लंगर डाला था। उसके बाद एक और पनडुब्बी की खबरें भी आईं। इस साल मई में श्रीलंका सरकार ने चीन की एक और पनडुब्बी को रुकने की अनुमति नहीं दी।

मालदीव में भारत के खिलाफ पाक-चीन की साजिश

अरब सागर में मालदीव

अरब सागर में मालदीव

पिछले हफ्ते अरब सागर के छोटे से देश मालदीव से असंतोष की जो खबरें मिली हैं, वे भारतीय नीति-निर्धारकों के लिए खतरे का संकेत हैं। वहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने फिर से सवालिया निशान लगे हैं। अंदेशा इस बात का है कि वहाँ की सेना किसी तरह सत्ता पर काबिज न हो जाए। भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए है, क्योंकि वहाँ चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत से भारत विरोधी माहौल भी पैदा किया जा रहा है। संयोग है कि जिस वक्त वहाँ की सड़कों पर हंगामा हो रहा था और सेना ने संसद में सांसदों का प्रवेश रोक दिया था, उसी वक्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दौरे सरकारी दौरे पर आए हुए थे। इस वक्त ऐसा लगता है कि देश के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन और सेना एक साथ हैं। वे किसी भी कीमत पर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद और उनकी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) को सत्ता में नहीं आने देंगे।

भारत समर्थक मोहम्मद नाशीद का तख्ता पलटा

मोहम्मद-नाशीद

साल 2012 में मोहम्मद नाशीद का तख्ता-पलट किया गया था (फाइल फोटो)

भारत समर्थक मोहम्मद नाशीद का सन 2012 में तख्ता-पलट किया गया था और बाद में उन्हें कई आरोपों में गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। वैश्विक हस्तक्षेप के बाद वहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई। राष्ट्रपति चुनाव में देश की अनोखी व्यवस्था के कारण अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बनने में सफल हो गए, पर संसद में उनका बहुमत नहीं है। हाल में संसद में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिशें की जा रहीं हैं, जिन्हें रोका जा रहा है। इस हफ्ते की घटनाएं उसी श्रृंखला का हिस्सा हैं। यह घटनाक्रम अभी चल ही रहा है।

भारतीय कंपनी का करार रद्द कर दिया चीन को काम

भारतीय-कंपनी

भारतीय कंपनी (फाइल फोटो)

सन 2012 में राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद को हटाने के बाद दिसम्बर 2012 में मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को बाहर का रास्ता दिखाकर हमें महत्वपूर्ण संदेश दिया था। माले के इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की देखरेख के लिए जीएमआर को दिया गया 50 करोड़ डॉलर का करार रद्द कर दिया गया। इसके बाद यह काम चीन को दे दिया गया। उन्हीं दिनों चीन ने श्रीलंका में आक्रामक डिप्लोमेसी की शुरुआत की थी। नवंबर 2012 में चीनी मदद से डेढ़ अरब डॉलर की राशि से विकसित हुए हम्बनटोटा बन्दरगाह का उद्घाटन हुआ। उसी साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में अमेरिका द्वारा श्रीलंका के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का भारत ने समर्थन किया था, जिससे श्रीलंका की महिंदा राजपक्षे सरकार नाराज थी। तब एक इंटरव्यू में राजपक्षे ने कहा था, भारत हमारा समर्थन करता तो यह प्रस्ताव आता ही नहीं। हालांकि पिछले साल से श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन के बाद से स्थितियाँ बदल गईं हैं।

पाकिस्तान-ईरान सीमा पर चीन ने बनाया ग्वादर बंदरगाह

ग्वादर-बंदरगाह

पाकिस्तान-ईरान सीमा पर चीन ने ग्वादर बंदरगाह तैयार कर लिया है

अलबत्ता पाकिस्तान-ईरान सीमा पर चीन ने ग्वादर बंदरगाह तैयार कर लिया है और वह ग्वादर से चीन के शेनजियांग प्रांत के काशगर तक चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर बना रहा है। पाकिस्तान ने सन 2007 में पोर्ट ऑफ सिंगापुर अथॉरिटी के साथ 40 साल तक बंदरगाह के प्रबंध का समझौता किया था। यह समझौता अचानक अक्तूबर 2012 में खत्म हो गया। इसे एक चीनी कम्पनी को सौंप दिया गया।

हिंद महासागर में चीनी सक्रियता

चीन के रक्षामंत्री लियांग गुआंग

सितम्बर, 2012 में चीन के रक्षामंत्री लियांग गुआंग ली श्रीलंका आए थे

हम्बनटोटा के उद्घाटन के दो महीने पहले सितम्बर, 2012 में चीन के रक्षामंत्री लियांग गुआंग ली श्रीलंका आए थे। तब चीन ने श्रीलंका को 10 करोड़ डॉलर (तकरीबन 550 करोड़ रु) की सैन्य सहायता देने की घोषणा भी की थी। माना जा सकता है कि लिट्टे के कारण लम्बे अर्से तक आतंकवाद से पीड़ित देश की सुरक्षा आवश्यकताएं हैं।

अंडमान निकोबार से 20 किमी दूर चीन ने बनाया सैनिक अड्डा !

अंडमान-निकोबार

अंडमान निकोबार से 20 किमी दूर चीन ने बनाया सैनिक अड्डा (फाइल फोटो)

सवाल है उसने बजाय भारत के चीन के सामने हाथ क्यों पसारा?  बंगाल की खाड़ी के उत्तर में कोको द्वीपों को म्यांमार सरकार ने 1994 में चीन को सौंपा था। हालांकि म्यांमार या चीन सरकार ने कभी आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की, पर यह बताया जाता है कि अंडमान निकोबार से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर चीन ने सैनिक अड्डा बना लिया है, जहाँ से भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है। भारत सरकार ने भी औपचारिक रूप से इस बात की पुष्टि कभी नहीं की, पर खंडन भी कभी नहीं किया। भारत के सारे मिसाइल परीक्षण और उपग्रह प्रक्षेपण के काम पूर्वी तट पर होते हैं। इस लिहाज से चीन का यह अड्डा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

जिबूती में भी चीन का सैनिक अड्डा

जिबूती

चीन ने छोटे से देश जिबूती में सैनिक अड्डा बनाया (फाइल फोटो)

अब चीन ने हिन्द महासागर और लाल सागर के मुहाने पर बसे छोटे से देश जिबूती में सैनिक अड्डा बनाया है। यह चीन की उस ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का हिस्सा है, जो वह मेनलैंड चीन से सूडान के पोर्ट तक बना रहा है।

अब चीन की निगाहें मालदीव के हवाई अड्डे पर

मालदीव-एयरपोर्ट

मालदीव एयरपोर्ट

मालदीव की घटनाएं चीन और पाकिस्तान की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। इसलिए हमें उनपर नजर रखने की जरूरत है। संकेत है कि मालदीव में धार्मिक चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं। चीन की निगाहें मालदीव के हवाई अड्डे पर भी हैं। यहाँ के घटनाक्रम पर नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि यहाँ भारत विरोधी ताकतें एकत्र हो रहीं हैं।

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