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स्पेशल रिपोर्ट: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से भारत की परेशानी बढ़ेगी

ईरानी राष्ट्रपति रूहानी और पीएम मोदी
फाइल फोटो

नई दिल्ली। गत सप्ताह ईरान के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाए गए एकपक्षीय आर्थिक प्रतिबंधों के बाद इसे कामयाब बनाने की बड़ी चुनौती अमेरिका के सामने होगी लेकिन इसने भारत के सामने बड़ी दुविधा पैदा कर दी है। अमेरिका के इस फैसले से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ईरान से रिश्तों पर आंच आएगी। अमेरिका ने कहा है कि ईरान से सभी देश एक मई से खनिज तेल खरीदना बंद कर दें। अमेरिका ने ईरान के साथ छह देशों के परमाणु समझौते को एकतरफा तोड़ने का ऐलान करने के बाद उसे  धमकी दे रहा है कि वह अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दे। अमेरिका के इस एकपक्षीय प्रतिबंध को भारत ने स्वीकार किया है और कहा है कि वह अपनी खनिज तेल की जरूरतों को दूसरे देशों से आयात कर पूरा करेगा। लेकिन चीन और तुर्की ने ऐसा करने से मना कर दिया है। ईरान के कुल तेल निर्यात का आधा चीन को जाता है जब कि भारत अपनी जरूरत का दस प्रतिशत ईरान से आयात करता रहा है लेकिन हाल में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती सामरिक साझेदारी के मद्देनजर भारत ने अमेरिका के साथ रिश्तों को अहमियत देते हुए कहा है कि वह इस मसले पर अमेरिका से आपसी बातचीत जारी रखेगा।





अमेरिका ने हाल में आतंकवाद के मसले पर भारत को जिस तरह समर्थन दिया है और इसके द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो कदम उठाए गए हैं उसके दबाव में चीन भी झुकने को मजबूर हुआ है। सम्भवतः अमेरिकी पहलों की बदौलत ही चीन अब आतंकवादी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी सूची में शामिल करने के प्रस्ताव पर अपनी तकनीकी रोक हटाने को तैयार होने का ऐलान मई के पहले सप्ताह में करने वाला है।

आतंकवाद के मसले पर भारत की इज्जत रखने की कीमत शायद अमेरिका भारत से वसूलना चाह रहा है।  ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों से भारत बचता रहा है लेकिन यह पहली बार होगा कि अमेरिकी प्रतिबंधों को पूरी तरह मानने को तैयार होगा। पिछली बार छह महीना पहले जब अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था तब भारत और कुछ अन्य देशों को अमेरिका सशर्त छूट देने को राजी हो गया था लेकिन अब यह छूट भी वापल से ली है।

भारत के सामने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन भारत अमेरिकी प्रतिबंधों को मानने को इसलिये मजबूर है कि वह अमेरिकी बैंकिंग चैनल को नजरअंदाज कर अपना आयात-निर्यात नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में ही संचालित होता है और भारत जैसे देश अमेरिकी बैंकिंग चैनल को नजरअंदाज कर अपना अंतरराष्ट्रीय व्यापार नहीं चला सकते।देखना होगा कि चीन और तुर्की किस तरह अमेरिकी बैंकिंग चैनलों की अवेहलना कर ईरान से खनिज तेल का आयात जारी रखते हैं। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से यूरोपीय यूनियन भी सहमत नहीं है लेकिन यूरोपीय कम्पनियां भी अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर ईरान से व्यापार और निवेश का रिश्ता नहीं बना सकतीं।

भारत की दुविधा यह है कि  मध्य एशिया और अफगानिस्तान के साथ रिश्तों को गहरा करने के लिये ईरान से भारत के रिश्तों की विशेष अहमियत है। उसे अमेरिका की भी दोस्ती की जरूरत है और ईरान से भी दोस्ती बनाए रखनी है। इसके पहले अमेरिका ने रूस पर कैटसा नाम के कानून के जरिये भारत जैसे देशों को चेतावनी दी थी कि वह रूस से रक्षा साज सामान नहीं खरीदे। लेकिन इस मसले पर अमेरिका से टकराव लेने के बदले भारत ने अमेरिकी अधिकारियों को समझाने बुझाने का रास्ता अपनाया और रूस से सम्बन्धित अमेरिकी प्रतिबंधों से भारत को छूट मिल गई। उम्मीद है कि ईरान से तेल व्यापार के मसले पर भी भारतीय अधिकारी अमेरिकी प्रशासन को भरोसे में लेने में सक्षम होंगे और ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों की मार भारत की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़े।

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