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Special Report: भारत का स्वाभाविक साझेदार है ताइवान

भारत-ताइवान

नई दिल्ली। ताइवान ने कहा है कि भारत और ताइवान ने भले ही सामरिक साझेदारी के समझौते नहीं किये हों लेकिन दोनों  एक दूसरे के स्वाभाविक साझेदार हैं। ताइवान के प्रतिनिधि त्येन चुंग क्वांग ने यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ताइवान भारत के साथ रिश्तों को विशेष अहमियत दे रहा है और इसी उद्देश्य से ताइवान और भारत के आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने के कदम उठाए जा रहे हैं।





यहां विदेशी मामलों के पत्रकारों के संगठन (आईएएफएसी) की एक बैठक में ताइवानी दूत ने कहा कि साल 2000 में ताइवान औऱ भारत के बीच दिवपक्षीय व्यापार एक अरब ड़ालर का हो रहा था जो 2018 में सात गुना से भी अधिक बढ़कर 7.5 अरब डालर हो गया है। ताइवानी दूत ने बताया कि पिछले साल भारत में ताइवानी निवेश 36 करोड़ डालर का हुआ जो काफी उत्साहजनक है। उन्होंने कहा कि भारत और ताइवान का व द्वपक्षीय व्यापार काफी संतुलित है औऱ इससे दोनों पक्षों को फायदा हो रहा है। भारत में ताइवानी निवेश में अचानक बढ़ोतरी हुई है। यह  निवेश साल 2016 की तुलना में 12 गुना अधिक है। उन्होंने कहा कि ताइवानी निवेशक भारत की ओर देख रहे हैं क्योंकि भारत की भौगोलिक स्थिति काफी  महत्वपूर्ण इलाके में है। ताइवान भारत को एक बड़े बाजार के तौर पर देखता है। यहां से न केवल अफ्रीकी तटों तक सम्पर्क बनाया जा सकता है बल्कि दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया आदि तक पहुंच बनती है।

यह पूछे जाने पर कि क्या ताइवानी व्यापारी चीन छोड़ कर भारत में निवेश करने को इच्छुक होंगे ताइवानी दूत ने कहा कि भारत में निवेश का माहौल अन्य प्रतिस्पर्द्धी बनाना होगा। ताइवानी व्यापारी वियतनाम और थाईलैंड जैसे देश भी देखते हैं जहां निवेश की शर्तें और सुविधाएं काफी बेहतर हैं। त्येन चुंग क्वांग ने कहा कि साल 2014 के बाद से भारत औऱ ताइवान के रिश्ते काफी तेजी से विस्तार लेने लगे हैं। ताइवान ने विदेशों के साथ रिश्ते गहरे करने के लिये न्यू साउथबाउंड नीति अपनाई है। इसमें भारत सहित 18 देशों को चुना गया है जिसमें भारत पर विशेष जोर दिया गया है।

यह पूछे जाने पर कि  हिंद प्रशांत इलाके में चार देशों के समूह के उभरने को ताइवान किस रूप में देखता है ताइवानी दूत ने प्रधानमंत्री मोदी की हिंद प्रशांत के लिये समावेशी नीति का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि हांगकांग  में चीन सरकार की एक देश दो प्रणाली की नीति को ठीक से नहीं लागू किया गया औऱ यह विफल रही जिसका असर ताइवान पर भी पड़ सकता है। गौरतलब है कि ताइवान चीन का एक प्रांत था जो सन् 1949 में चीन से अलग हो गया। वहां एक स्वतंत्र सरकार गठित है।

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