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स्पेशल रिपोर्ट: भूटान में पहले राउंड के चुनाव पर भारत की नजर

भूटान में चुनाव
भूटान में चुनाव (प्रतीकात्मक)

नई दिल्ली। भारत और भूटान के बीच में स्थित देश भूटान में तीसरे संसदीय चुनावों का पहला राउंड 15 सितम्बर को होगा जिसपर भारत औऱ चीन के सामरिक पर्यवेक्षकों की नजर लगी है। चुनावों का दूसरा दौर 18 अक्टूबर को होगा।





भूटान जैसे युवा जनतंत्र के लिये यह चुनाव एक  बड़ी उपलब्धि है। भूटान के शासन में जनतांत्रिक सरकार की भूमिका अहम हो गई है और इसके चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा ही भूटान की अहम विदेश नीति की भावी दिशा तय होगी इसलिये भूटान की नई सरकार भारत औऱ चीन के साथ अपने रिश्तों को किस तरह पारिभाषित करती है, इस पर पर्यवेक्षकों की नजर लगी रहेगी।

पिछले साल भूटान के दावे वाले डोकलाम इलाके में चीन द्वारा सड़क निर्माण को लेकर भारत औऱ चीन के सैनिकों के बीच हुई तनातनी के बाद भूटान के लोगों की राय पर सभी  की निगाहें टिकी हैं। भारत की विदेश नीति में भूटान को  हमेशा प्राथमिकता दी गई है औऱ भूटान की विदेश नीति भारत के दिखाए कदमों पर ही चलती रही है।

भारतीय सामरिक हलकों में इस बात को लेकर संतोष है कि  संसदीय चुनावों में भाग ले रहे चारों राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र भारत के साथ रिश्तों को प्राथमकिता देने का वादा कर रहे हैं। इसमें मौजूदा प्रधानमंत्री तोबगे  की पार्टी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी( पीडीपी) , द्रुक  फ्युनसंम त्सोगपा ( डीपीटी), द्रुक न्यामरुप त्सोगपा ( डीएनटी) और भूटान कुयन न्याम पार्टी( बीकेपी ) ने अपनी विदेश नीति में भारत को प्राथमिकता देने की बात कही है। चारों दलों ने भारत के साथ आर्थिक रिश्तों को भी अहमियत दी है। लेकिन पीडीपी औऱ डीपीटी ने भूटानी युवा के लिये बड़ी चिंता की बात  रोजगार पैदा करने को भी प्राथमिकता दी है। दूसरी ओर डीएनटी ने  भारतीय बिजली घरों के जरिये रोजगार पैदा करने को अतिशयोक्ति बताया है। लेकिन चारों दलों ने निर्यात बढ़ाने के उपायों पर जोर दिया है। पनबिजली पर भूटान की अर्थव्यवस्था के निर्भर  होने को चिंताजनक बताया गया है। जब कि डीपीटी ने तीसरे देश के लिये भूटान से निर्यात में भारत को मददगार के तौर पर देखा है।

जहां पीडीपी और डीपीटी ने एक-एक बार सत्ता सम्भाली है वहीं बीकेपी औऱ डीएनटी अपनी राजनीतिक औऱ राजनयिक शब्दावली  तैयार करने में ही जुटी है। सभी चारों पार्टियों ने आत्मनिर्भरता औऱ सार्वभौमिकता पर जोर दिया है।

डीपीटी और दो नई पार्टियों ने चीन का  जिक्र अपने चुनाव घोषणा पत्र में  नहीं किया है जब कि पीडीपी ने कहा है कि वह चीन के साथ सीमा मसले पर बात जारी रखेगी। साफ है कि भूटानी राजनीतिक दल चीन को साथी देश के तौर पर नहीं देख रहे  है। लेकिन भूटान के लोग अब नेपाल की ओर भी देख रहे हैं  और भारत को यह नहीं समझना चाहिये कि भूटान के जनतांत्रिक चुनावों में कोई अधिक राष्ट्रवादी होने का दावा कर चीन के साथ रिश्ते बना कर भी अपने  देश और लोगों के लिये  फायदा उठाने की बात करे।

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