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…तो इसलिए मांगी ट्रम्प ने इमरान से मदद !

ट्रंप और इमरान

लॉस एंजेल्स से ललितमोहन बंसल

अफगानिस्तान में  अमेरिका के धैर्य का बाँध  टूटने लगा है। आतंकवाद से सख्ती से नहीं  निबटने के मुद्दे पर अमेरिका  अब तक पाकिस्तान को आड़े हाथ लेता रहा है लेकिन गत तीन दिसम्बर को अमेरिकी  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से अफगानिस्तान के मसले पर  मदद मांग कर सबको हैरान कर दिया।





दूसरी ओर पिछले दिनों स्विस नगर जेनेवा में अमेरिकी प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने चाहे अनचाहे शांति बहाली के लिए अपने चीफ़ ऑफ स्टॉफ़ और विश्वास पात्र अब्दुल सलाम रहिमी के नेतृत्व में बिना किसी शर्त बारह सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल की घोषणा तो कर दी, पर साथ ही एक पंक्ति यह भी जोड़ दी कि शांति प्रक्रिया में ‘आतंकवादी नेटवर्क’ को हस्तक्षेप की इजाज़त नहीं होगी।

उन्होंने स्पष्ट तो नहीं किया लेकिन उनका इशारा मिलिटेंट तालिबान पर रहा होगा। मिलिटेंट तालिबान देश के आधे से अधिक हिस्से पर नियंत्रण कर चुके हैं। मिलिटेंट तालिबान और उनके सहायक हक्कानी नेटवर्क के लड़ाके  किसी भी स्थिति में अफ़ग़ानिस्तान तंत्र, उसकी सेना और पुलिस को भाव नहीं देना चाहते। वह तो अफ़ग़ान सरकार को अमेरिका की पिट्ठू मानती है। इधर अमेरिका है जो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन के लिए भारत की सराहना कर पाकिस्तान की अरबों डालर की मदद रोकता है तो अगले ही क्षणों में उसके प्रधान मंत्री को पत्र लिख कर आग्रह करता है कि वह मिलिटेंट तालिबान को किसी तरह शांति बहाली के लिए मेज़ तक ले आए।

मिलिटेंट तालिबानी नेताओं में से कुछ नरम दल के नेता क़तर में अमेरिकी प्रतिनिधि से बातचीत भी कर आते हैं लेकिन एक मुश्त बातचीत करने से फिर पीछे हट जाते हैं। उनकी माँगें ही ऐसी हैं जो चौंका देने वाली हैं। इन माँगों में से एक अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव स्थगित हों, तो दूसरी उनके सभी क़ैदियों को रिहा किया जाए। तीसरी शर्त और भी टेढ़ी है। कहते हैं जब तक शांति प्रक्रिया चले राष्ट्रपति कोई ऐसा हो जो निष्पक्ष हो। बहरहाल कशमकश जारी है।

अब ट्रम्प प्रशासन इज़्ज़त के साथ ‘पतली गली’ से निकलने को आतुर हैं। वह लुका-छिपी का खेल कर रहे मिलिटेंट तालिबान को किसी भी तरह सीधी वार्ता के लिए मेज़ पर लाना चाहता है ताकि राजमहल की चार दीवारी में क़ैद अशरफ़ गनी चहल क़दमी के लिए बाहर निकलें। इस बीच कोशिशें भी ढेरों हुईं। अमेरिकी दबाव की राजनीति सिर चढ़ कर बोलने लगी तो शांति बहाली के लिए बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। इसके बावजूद तालिबानी लड़ाकों की आतंकवादी हरकतें जारी हैं।

यहाँ बता दें कि शांति बहाली के लिए भारत की कोशिश रही है कि बातचीत अफ़ग़ानिस्तान की चुनी हुई सरकार के नेतृत्व में एकता और सम्भाव के आधार पर हो जिसमें सुरक्षा, स्थायित्व और समृधि को आगे बढ़ाया जा सके। इसके लिए भारत ने अफ़ग़ानिस्तान की चुनी हुई सरकार के साथ मिल कर यह एेतिहासिक और सामरिक संबंधों के आधार पर मित्रता का धर्म निभाया है और दो अरब डालर व्यय किए है। यह बात भारत ने विभिन मंचों पर कही है जबकि तालिबान शांति प्रक्रिया में सीधे अमेरिका से बातचीत करने के लिए अड़ा है।

बातचीत के बाद  अमेरिकी प्रतिनिधि ख़लीलजाद अगले दिन काबुल पहुँचे और उन्होंने अशरफ़ गनी से बातचीत कर साफ़-साफ़ कहा कि 20 अप्रैल को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव स्थगित किए जाएं और छह माह में तालिबान के साथ मिल बैठकर समझौता कर लिया जाए। बातचीत के कुछ अन्य हिस्से यों थे।  एक, शांति प्रक्रिया अगले छह माह में पूरी हो। दो, अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया की शुरुआत युद्ध विराम से हो। इसके जवाब में तालिबानी प्रतिनिधियों ने भी दो प्रस्ताव पेश किए थे।

एक, अफ़ग़ानिस्तान में अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव बिना शर्त स्थगित किए जाएँ। दूसरे, शांति प्रक्रिया पूरी होने तक एक अंतरिम सरकार स्थापित हो तथा राष्ट्रपति के पद पर  निष्पक्ष व्यक्ति को आसीन किया जाए। तालिबान की यह शर्त स्वीकार नहीं की गई। हाँ,  अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान ने तालिबानी मुल्ला अब्दुल गनी बारदार को ज़रूर रिहा कर दिया।

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