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पाकिस्तान : पश्तूनों की आवाज को नजरंदाज करना अब मुश्किल?

पश्तून आंदोलन
पश्तून आंदोलन (प्रतीकात्मक)

पाकिस्तान में चल रहे पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पीटीएम की मांग केवल न्यूनतम मानव अधिकारों की है जिसका पाकिस्तानी सरकारें लगातार हनन कर रही हैं।





यह पाकिस्तान के पश्तूनों की मानसिक व्यथा और वर्षों के अन्याय तथा अपमान की कहानी है। यह अल्पसंख्यक समूह कई दशक से सरकारी उत्पीड़न और मानवाधिकारों का उल्लंघन झेल रहा है।  पश्तून की कहानी वर्षों से गायब बेटों की, कभी वापस न लौटने वाले पिताओं की, तोड़ दिए घरों की और सुरंगों-खदानों में अपंग बच्चों की है। यह विधवाओं के क्रंदन और पिताओं की दुखद झुर्रियों की पीढ़ियों से परे की तड़पाने वाली कहानियां हैं।

सेना और आतंकवादियों के बीच की लड़ाई में एक तरह से कबीलाई माने जाने वाले पश्तून लंबे समय से पिस रहे हैं।  2001 के अफगान युद्ध के समय से, पश्तून आप्रवासी गरीबी तथा उपेक्षा में जीवन बिताने को मजबूर रहे हैं। ये निराश्रित कभी यह नहीं जान पाते कि कब अगली गोली उन्हें अथवा उनमें उनमें से किसी को मार डालेगी या उनमें से कब किसे हजारों गायब लोगों की सूची में जोड़ दिया जाएगा। पश्तून इलाकों से आतंकवाद खत्म करने के पाकिस्तानी सेना के अभियान के बहाने पश्तूनों की हत्या की जा रही है। पीटीएम इसके खिलाफ रैलियां कर रहा है, जिनमें पूरे देश से विशेषकर खैबर पख्तूनख्वा और फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरिया (फाटा) से काफी संख्या में लोग हिस्सा ले रहे हैं।

पश्तूनों के विरोध की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन जनवरी में नकीबुल्ला मेहसूद की हत्या ने पश्तूनों के आंदोलन में तेजी ला दी। दक्षिण वजीरिस्तान के युवा पश्तून नकीबुल्ला की कराची में राव अनवर नामक पुलिस अधिकारी ने फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी थी। इसके खिलाफ कुछ सप्ताह बाद राजधानी तक एक लंबा मार्च निकाला गया।

पीटीएम के युवा नेता वजीरिस्तान के मंजूर पश्तीन मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। वह पाकिस्तान की सत्ता और पाकिस्तानी सेना से लोहा लेने के लिए तैयार हैं। पश्तीन कहते हैं कि पश्तून कोई टिशू पेपर नहीं हैं कि सत्ता उनका इस्तेमाल करे और फेंक दे। पीटीएम ने लाहौर, क्वेटा, पेशावर और अब कराची में रैलियां की हैं। हत्यारों की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाने, गायब लोगों को अदालत में हाजिर करने, निर्दोषों को रिहा करने, फाटा से कर्फ्यू हटाने, स्थानीय लोगों का उत्पीड़न रोकने आदि की मांग की। सरकारी उत्पीड़न के बावजूद पश्तून आंदोलन फैलता जा रहा है और जन आंदोलन का प्रतीक बनता जा रहा है।

पश्तून पश्चिमी अफगानिस्तान सीमा वाले इलाकों में औपनिवेशिक कानूनों के साये में रहते हैं, जहां किसी एक व्यक्ति के अपराध की सजा पूरे समाज को दी जाती है, लोगों को जबरिया बाहर कर दिया जाता है, संपत्ति जब्त कर ली जाती है और लोगों को अदालतों तक नहीं जाने दिया जाता। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि 2017 में हिंसा की घटनाएं बढ़ीं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन खून से रंगे हाथों के साथ क्या पाकिस्तान कश्मीर पर अपने खोखले दावों को न्यायसंगत ठहरा सकता है। इस आंदोलन से यह तय माना जा रहा है कि यह पाकिस्तान के राष्ट्रवाद के विचार को नए सिरे से परिभाषित करेगा। अल्पसंख्यकों की आवाज की अनदेखी का एक बड़ा सबक 1971 में पाकिस्तान को मिल चुका है। पाकिस्तान पीटीएम की ज्यादा समय तक अवहेलना भी नहीं कर सकता।

 

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