DEFENCE

इजराइल डेः 1962 के युद्ध में पड़ी थी भारत-इजराइल के रक्षा रिश्तों की बुनियाद

नई दिल्ली। बुधवार को इजराइल अपनी स्थापना की 70 वीं सालगिरह मना रहा है और पिछले साल ही भारत ने इजराइल के साथ राजनयिक रिश्तों की स्थापना की रजत जयंती मनाई है। इन वर्षों में जहां इजराइल एक ताकतवर देश के तौर पर उभरा है वहीं पिछले 25 वर्षों के भीतर भारत और इजराइल के सहयोगपूर्ण रिश्तों ने भारत को भी एक ताकतवर देश के तौर पर उभरने में मदद दी है। वास्तव में भारत और इजराइल के बीच आज रक्षा क्षेत्र में जो मजबूत रिश्ते बन चुके हैं उसकी बुनियाद 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान ही पड़ चुकी थी।





1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल में इजराइल के साथ राजनयिक रिश्तों को औपचारिक आवरण दिया गया। हालांकि भारत ने 1950 में ही इजराइल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी लेकिन दोनों देशों ने एक दूसरे की राजधानियों में अपने-अपने दूतावास 1992 में ही खोले। लेकिन यह कम ही लोगों को पता है कि 1950 में ही भारत और इजराइल आपसी राजनयिक रिश्ते स्थापित करने के काफी नजदीक पहुंच गए थे। लेकिन केवल धर्म के आधार पर एक राष्ट्र की स्थापना की वजह से भारत ने तब इजराइल के साथ रिश्ते बनाने में हिचक इसलिये दिखाई कि भारत औऱ पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। पचास के दशक में मिस्र के स्वेज नहर संकट की वजह से भारत ने इजराइल के साथ अपने पूर्ण राजनयिक रिश्ते स्थापित करने का फैसला टाल दिया। तब मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासेर ने जब स्वेज कनाल का राष्ट्रीयकरण कर दिया तो इजराइल ने अपनी सेना मिस्र में भेज दी। तब नासेर औऱ भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आपसी समीकरण काफी अच्छे बन चुके थे क्योंकि वह निर्गुट आन्दोलन के अग्रणी नेताओं में उभर चुके थे। इसके बाद शीतयुद्ध का दौर काफी गहरा गया और भारत द्वारा पूर्ण राजनयिक रिश्ते बनाने का फैसला  ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। इस दौरान भारत ने फलस्तीनी मसले को जोरशोर से अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिया। भारत के इस रुख के बावजूद 1962 के भारत-चीन युद्ध में इजराइल ने भारत को सैन्य मदद दी। जवाहर लाल नेहरू ने इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेन गुरियन से सैन्य मदद मांगी थी जिस पर गुरियन ने फौरन कार्रवाई की। भारत और इजराइल के बीच गहरे रक्षा सम्बन्धों की आधारशिला इस तरह 1962 में ही रख दी गई थी। 1965 और 1971 के युद्धों में भी इजराइल ने भारत को सैनिक साज सामान से मदद दी थी। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इजराइली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर से सैनिक मदद मांगी तो उस पर तुरंत कार्रवाई की गई। इसी तरह 1999 में करगिल युद्ध के दौरान इजराइली रक्षा मंत्रालय में महानिदेशक भारत पहुंचे और भारतीय सेनाओं को हर तरह से मदद की पेशकश की। वास्तव में करगिल की चोटियों पर जब पाकिस्तानी सैनिक जेहादी भेष में चढ़ बैठे थे तब उन्हें वहां से बेदखल करने के लिये मिराज-2000 लड़ाकू विमानों में इजराइल से आयातित जो लेजर पाड लगाए गए उनकी बदौलत ही उन चोटियों पर अचूक निशाना लगा कर उनके ठिकानों को तहस-नहस किया जा सका था।

आज भारत और इजराइल के बीच आपसी विश्वास इतना गहरा हो चुका है कि इजराइल भारत के सबसे बड़ा रक्षा साझेदारों में उभर चुका है। इजराइली तकनीक की मदद से भारत की सेनाएं पड़ोसी चीन और पाकिस्तान की सेनाओं पर भारी पड़ने लगी हैं। इजराइल की रक्षा कम्पनियों ने भारत को अत्याधुनिक शस्त्र प्रणालियों की सप्लाई की है जिनमें अवाक्स टोही विमान में लगा फालकन रेडार,  मिसाइलों में लगने वाली संवेदनशील प्रणालियां आदि उल्लेखनीय कही जा सकती हैं।

Comments

Most Popular

To Top