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मुंह में बात, बगल में छुरी से तो बात नहीं बनने वाली

नापाक पाकिस्तान का दोगलापन एक बार फिर जगजाहिर हुआ है। जम्मू के आरएसपुरा सेक्टर में सोनीपत निवासी सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान के साथ बर्रबरता, आतंकवादी बुरहान वानी के डाक टिकट जारी कर उसे महिमामंडित करना और जम्मू-कश्मीर में तीन पुलिसकर्मियों की पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों द्वारा हत्या करना यह जताता है कि पाकिस्तान करता कुछ है और कहता कुछ और है। इन हालात में भला दोनों देशों के बीच बातचीत कैसे हो सकती है। ऐसे में तो भारत द्वारा अगले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र सभा की बैठक के दौरान भारत-पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक को रद्द करना स्वाभाविक था। पाकिस्तान को यह सोचना चाहिए कि वह इन परिस्थितियों में किस मुंह से भारत से मुलाकात करना चाहता था।





हमारा पड़ोसी पाकिस्तान बार-बार हर जगह, हर छोटे-बड़े मंच पर यही कहता है कि उसकी जमीन पर आतंक की फसल नहीं उगाई जाती, उसके यहां आतंकियों के पनाहस्थल और ट्रेनिंग कैंप नहीं हैं। फिर भला वे कौन लोग हैं जो पाकिस्तान की सीमा से भारत की सरहद पर लगातार घुसपैठ की कोशिश करते हैं। मार गिराये जाने पर छानबीन के बाद यही तथ्य सामने आता है कि उस आतंकी की पूरी शख्सियत पाकिस्तान की देन थी। हरियाणा के सोनीपत के जाबांज BSF जवान के साथ की गई क्रूरता और बर्बरता पर पाक ने कहा कि उसने ऐसा पशुवत व्यवहार नहीं किया। तो फिर भला उस सीमा पर कौन था जिसने उस जवान के साथ ऐसा व्यवहार किया। सफेद झूठ की भी सीमा होती है। पाकिस्तान के हुक्मरानों को चेतने की जरूरत है।

इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान बनने के बाद से ही वहां के हुक्मरानों ने सरहद और अंतर्राष्ट्रीय मंच तक झूठ, फरेब, प्रपंच का सहारा लिया है। भारत ने जब-जब दोस्ती का हाथ बढ़ाया है उसे धोखा ही मिला है। चाहे वह दोनों देशों के विभाजन के बाद का शुरुआती दौर हो या फिर अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रत्याशित यात्रा के बाद पठानकोट हमला हो। हो सकता है क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की दिली मंशा रही हो कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरें। लेकिन सरहद पर की जा रही पाकिस्तान की हरकतें भला दोनों देशों के बीच बातचीत की इजाजत कैसे दे सकती हैं। और वैसे भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान इस बात से बखूबी वाकिफ होंगे कि पाकिस्तान की सत्ता फौज के पास है न कि राजनेताओं के पास। भारत भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है। फिर ऐसे निरीह शासकों से किस आधार पर मुलाकात और बातचीत की जाये। यह थोड़ा कड़वा है पर सच यही है।

यह सही है कि रिश्ते सुधारने के लिए मेल-मुलाकात के लिए ठोस बातचीत की जरूरत होती है पर बातचीत के लिए भी अनुकूल माहौल तथा बेहद ईमानदारी की जरूरत होती है। मुंह में बातचीत और बगल में छुरी से ही हर बार पाकिस्तान ने दोनों देशों की बातचीत को धूल-धूसरित कर दिया है। पाकिस्तान के लिए यह शर्म की बात है कि सरहद की सुरक्षा पर तैनात BSF जवान के साथ ऐसा पशुवत व्यवहार किया। दुनिया के तमाम मुल्कों में तनाव और टकराव होता है पर क्या ऐसी अमानवीय हरकतें होती हैं? लिहाजा इन हालात में भारत को सधे कदमों से वीर जवानों के शौर्य और देश की संप्रभुता की रक्षा के साथ लगातार आगे बढ़ने की जरूरत है। पाकिस्तान विदेशमंत्री के साथ बैठक को रद्द कर उसने इस बात का परिचय दिया है।

 

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