International

वाशिंगटन से विशेष रिपोर्ट: डोनाल्ड ट्रम्प की नाटो के दरवाज़े पर दस्तक !

डोनाल्ड ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)

वाशिंगटन से ललित मोहन बंसल…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जून महीने में दो बार नाटो के सहयोगी राष्ट्रों को हड़का कर नाटो के अस्तित्व को चुनौती दी है। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या नाटो का भी वही हश्र होगा जो पिछले दिनों G-7 देशों की समिट का हुआ था। ट्रम्प ने नाटो के सहयोगी राष्ट्र को एक पत्र लिख कर यह चेतावनी दी थी कि वे अपने देश की सुरक्षा चाहते हैं तो ‘वेल्स-2014’ के शिखर सम्मेलन में बनी परस्पर सहमति के अनुसार अपनी GDP के दो प्रतिशत का हिस्सा नाटो डिफ़ेंस फ़ंड में जमा करवा दें। उन्होंने वर्षों पुराने पड़ोसी कनाडा के प्रधान मंत्री जस्टिन ट्रूडो, जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्कल तथा बेल्जियम के प्रधान मंत्री चार्ल्स माइकल के नाम भी पत्र लिख दिए।





जी-7 देशों के समिट में ट्रम्प और एंजेला सहित अन्य राष्ट्राध्यक्षों के रिश्तों में आई कड़वाहट के बाद जर्मन रक्षा मंत्री उर्सला वान डेर लियों सीधे व्हाइट हाउस चली आईं। उन्होंने दस वर्षों के लिए बतौर गारंटी अपनी GDP का दो नहीं, डेढ़ प्रतिशत जमा करवाने के लिए निवेदन भी कर दिया। लेकिन बेल्जियम के प्रधान मंत्री चार्ल्स माइकल को यह सब अच्छा नहीं लगा, तो चुनौती दे डाली। कहते हैं:वेल्स सहमति दिशा निर्देश है, कोई क़ानूनी संविदा नहीं है। यह सहमति रूसी सेनाओं की ओर से क्रीमिया के अतिक्रमण के बाद वेल्स शिखर सम्मेलन में बनी थी।

बहरहाल, 29 देशों की सूची में अमेरिका सहित आठ देशों–इंग्लैंड, ग्रीस, पोलैंड, लातीविया, एस्टोनिया, रूमानिया और लिथुआनिया ने फ़ंड जमा करा दिए हैं। एक पत्रकार ने ट्रम्प के मुरीद नाटो महासचिव स्टोलनबर्ग से पूछ लिया। बोले :11, 12 जुलाई को विएना में नाटो समिट से पूर्व फ़ंड जमा कराने वाले 15 देश हो जाएँगे।लेकिन इससे फ़र्क़ क्या पड़ता है? यह कहाँ लिखा है, नाटो अस्तित्व के लिए यह सब करना ज़रूरी है? लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि इसके अस्तित्व पर ख़तरा है ही। अमेरिकन यूनिवर्सिटी में अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रो॰ जेम्स गोल्ड गियर को विएना समिट का हश्र भी क्यूबेक जी 7 देशों की तरह लग रहा है।

असल में नाटो शिखर सम्मेलन ऐसी विकट स्थिति में हो रहा है, जब अमेरिका और यूरोपीय देश दोराहे पर खड़े हैं। नाटो के अध्यक्ष होने की स्थिति में ट्रम्प को योरपीय देशों से ‘ट्रेड वार’ की बजाए बड़प्पन का हाथ बढ़ाना चाहिए था। उन्हें सार्वजनिक तौर पर नीचा दिखाने का कोई औचित्य नहीं है। फिर उन्होंने ईरान के साथ आणविक डील को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बता दिया और अब उनसे आर्थिक प्रतिबंधों में सहयोग की गुहार कर रहे हैं। यही नहीं, यूरोपीय देश इस बात से भी परेशान हैं कि आख़िर ट्रम्प 16 जुलाई को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिल क्यों रहे हैं? वह क्या हासिल करना चाहते हैं? उन्हें ट्रम्प का यह कथन भी विचलित कर रहा है कि रक्षा मंत्री जान मैटिस नाटो देशों के योगदान और उन पर ख़र्चों का विवरण ले कर ब्रसेल्स हाज़िर हों।

टाइम्स पत्रिका के अनुसार अमेरिका ने नाटो डिफ़ेंस फ़ंड में 22 प्रतिशत दिए हैं। अमेरिकी सीनेट की विदेश और अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों तथा निगरानी समिति में डेमोक्रेटिक पार्टी के चार सिनेटरों– बॉब मेंडिज, डिक डरबिन, मार्क वारनर और रैंक रीड ने सोमवार को ट्रम्प को एक पत्र लिख कर आगाह किया है कि वह ऐसा कोई क़दम ना उठाएँ, जिस से देश को शर्मसार होना पड़े। उन्हें भय है कि उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन को एक महान नेता बताने वाले ट्रम्प ने फ़िज़ूलखर्ची के नाम पर दक्षिण कोरिया के साथ अगले महीने होने वाली संयुक्त मिलिट्री ड्रिल को रद्द किया है, वह ऐसे ही कहीं रूस से लगती पूर्वी यूरोप की सीमा पर संबंधित देशों के साथ होने वाली मिलिट्री ड्रिल को भी रद्द न कर दें। अगर ऐसा होता है तो नाटो देशों के अस्तित्व के लिए यह चुनौती होगी।

इस सब के बावजूद अमेरिका में एक बड़ा पक्ष ऐसा भी है, जो सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध में उपजी सात दशक पुरानी ‘नाटो’ की मज़बूत जड़ों के प्रति पूर्णतया आश्वस्त है। कांग्रेस ने हाल में नाटो के लिए मौजूदा वित्त वर्ष में क़रीब पाँच अरब और अगले वर्ष के लिए यूरोपीय सुरक्षा निवारक पहल के रूप में साढ़े छह अरब की राशि पर सहमति जताई है। फिर अभी हाल ही में अमेरिकी और पोलैंड की सेनाओं ने बाल्टिक और पोलैंड के बार्डर पर मिलिट्री ड्रिल की है। लातवियन विदेश मंत्री एडवरद रिंकेविक्स कहते हैं, अमेरिका के सुरक्षात्मक ढाँचे, संसाधन और  क्षमता के बारे में कल्पना नहीं की जा सकती। पेंटागन प्रवक्ता मेजर शेरिल क्लिनकेल कहते हैं, अमेरिकी जनता नाटो के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिकी राष्ट्रपति नीति में कोई परिवर्तन ला पाएँगे, नामुमकिन है।

Comments

Most Popular

To Top