International

अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता के लिए उत्सुक है अमेरिका

अफगानिस्तान में यूएस आर्मी

लॉस एंजेल्स से ललित मोहन बंसल…

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो के शांति वार्ता प्रस्ताव पर मंगलवार को जनरल जान निकलसन ने स्पष्ट किया है कि शांति वार्ता के लिए तालिबान को सीधे अफ़ग़ानिस्तान सरकार से बात करनी होगी। वह शांति वार्ता में तालिबान अथवा अफ़ग़ानिस्तान की जनता के लिए मददगार तो हो सकती है, किंतु अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान सरकार का स्थानापन्न नहीं हो सकती। माइक पोंपियो पिछले सप्ताह अफ़ग़ानितान के दौरे पर थे। पोंपियो ने एक और बात पर ज़ोर दिया था कि शांति वार्ता में किसी भी निदान पर पहुँचने से पहले इस क्षेत्र की ‘शक्तियों’ से सलाह मशवरा कर लेना ज़रूरी होगा। उन्होंने इन क्षेत्रीय शक्तियों के नामों का उल्लेख नहीं किया। उनका इशारा निस्सन्देह भारत की ओर होगा। पाकिस्तान और चीन अफगनिस्तान के पड़ोसी देश हैं। अमेरिका इन दोनों देशों पर आज कितना भरोसा करता है, यह जगज़ाहिर है। भारत सामरिक दृष्टि से अफ़ग़ानिस्तान का मित्र है। आतंकवाद के बारे में भारत और अफ़ग़ानिस्तान की एक ही सोच है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैदेव ज़ोर दिया है कि शांति वार्ता अफगनिस्तान के नेतृत्व में और उसके नियंत्रण में हो। यही नहीं, भारत ने अफगनिस्तान के आर्थिक विकास और पारस्परिक सहयोग में दो अरब डालर व्यय किए हैं। ट्रम्प प्रशासन भी इस भारतीय सोच का क़ायल है।





तालिबान का अफगानिस्तान के 43 फीसदी भू भाग पर नियंत्रण

इस शांति वार्ता प्रस्ताव पर क़तर में बुधवार को तालिबान के एक प्रवक्ता सोहेल शाहीन ने इस न्योते पर एक बार फिर दो टूक शब्दों में कुछेक शर्तें रख दी। एक, पहले अमेरिका अपने ट्रूपस हटाए। दूसरे, संयुक्त राष्ट्र से कह कर उनके कुछ साथियों के नाम काली सूची से हटवाए। फिर नाटो देशों की दख़लंदाज़ी पर भी उन्हें एतराज़ है, आदि आदि। तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान के 43 प्रतिशत भू भाग पर नियंत्रण है। उसने देश में इस्लामिक एजेंडे के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती और हिंसक आंदोलन के लिए पिछले छह महीनों में 1692 निरीह नागरिकों की हत्या की है। पिछले महीने ईद के अंतिम दिनों तालिबान ने मात्र तीन दिनों के लिए सरकार से ‘सीजफ़ायर’ का समझौता और लोगों से घुल-मिल कर एक अच्छे माहौल के संकेत दिए थे। बाद में, तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह भविष्य में नागरिकों पर कोई हमला नहीं करेगा और ना ही आत्मघाती दस्तों का इस्तेमाल करेगा। तालिबानी प्रवक्ता जवीहल्ला मुजाहिद ने मीडिया से इस की पुष्टि करते हुए बताया था कि उच्चस्तर से लड़ाकों को आदेश दिया जा चुका है कि वे नागरिकों पर आत्मघाती दस्तों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

आईएसआईएस का क़हर

इस बीच इराक़ और सीरिया से अपदस्थ आईएसआईएस ने पिछले महीने तालिबान पर जो क़हर ढाया, वह चौंकाने वाला है। तालिबान भले ही वहाँ 1994 से बैठा है, लेकिन मंगलवार को आईएसआईएस ने ख़ोरसन प्रांत में तालिबान कमांडर सार-ए पुल के घर पर हमला बोल कर 15 मिलिटेंट को मौत के घाट उतार दिया। यह चौंकाने वाली घटना थी। सीरिया और इराक़ में ठोकर खाने के बाद अब आईएसआईएस अफ़ग़ानिस्तान में जड़ें ज़माने में लगा हुआ है। देश के पूर्वी सीमावर्ती जलालाबाद, नानगहर में हिंसक गतिविधियों में लगा है। अफ़ग़ानिस्तान में अधिकृत तौर पर तीन हज़ार आईएसआईएस मिलिटेंट होने का अनुमान बताया जा रहा है। हालाँकि साथ में यह भी कहा जा रहा है कि मिलिटेंट की मौजूदगी का ठीक-ठीक अनुमान लगाना संभव नहीं है। इनके ठिकानों में एक पाकिस्तान सीमा पर ख़ैर पख्तुनवा की बीहड़ पहाड़ियाँ बताया जा रहा है।

पिछले एक महीने में सात आत्मघाती हमले

आईएसआईएस ने पिछले एक महीने में सात आत्मघाती हमले किए हैं, जिनमें बलूचिस्तान के मस्तूँग में बम के प्लांट करने और इसमें एक बलोच नेता सिराज रायसानी सहित 149 लोगों के मारे जाने की ज़िम्मेदारी आईएसआईएस ने ली है। पाकिस्तानी मीडिया बताती है: बलूचिस्तान के जिस छोटे से क़सबे में इस वारदात को अंजाम दिया गया है, वह शासन के लिए उपेक्षित, उद्योग विहीन, क्षेत्र में सेना की दमनकारी नीतियाँ, मीडिया पर अंकुश और फिर लोगों की चुनाव में कोई रुचि ही नहीं थी। इसके बावजूद मस्तूँग में इतने बड़े हमले का कोई औचित्य नहीं समझ आ रहा है। इससे पाकिस्तान की आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को धक्का लगा है। पाकिस्तान अमेरिकी निगाह में गिरे हैं। उसकी इकानमी ध्वस्त हुई है। काबुल में जुलाई के महीने में जो हमले हुए हैं, इनका अंजाम आईएसआईएस ने दिया है।

ईएसआईएस के ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई के आदेश

अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने आईएसआईएस की इन बढ़ती हिंसक गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए आईएसआईएस के ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई के आदेश दिए हैं। अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में सत्रह साल, दो खरब डालर का व्यय और 6251 अमेरिकी सैनिक गँवा देने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि ‘’दक्षिण एशियाई रणनीति-अफ़ग़ानिस्तान-2017’’ सफल हो। अफ़ीम से बेशुमार राजस्व और सड़क के इर्द-गिर्द बस्तियों से उगाही करने वाले तालिबान और अब आईएसआईएस को क्या ट्रम्प की नीति और नियत समझ आएगी, एक बड़ा सवाल है।

Comments

Most Popular

To Top