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योग दिवसः सेना भी करती है आसन, प्राणायाम और ध्यान

Kaushal Bhardwaj

बर्फीली दुर्गम पहाड़ियों, तपते रेगिस्तान, खतरनाक जंगलों में तरह-तरह की चुनौतियों के बीच सेना तथा सशस्त्र बलों के जवान व अफसर बड़े मनोयोग से आसन, प्राणायाम और ध्यान करते हैं। देखने में आया है कि योग करने से उनकी शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ मन की एकाग्रता पर चमत्कारिक असर पड़ता है जो कर्तव्य पालन में उनके बड़े काम का होता है। वह और साहस, पराक्रम तथा जांबाजी के साथ सरहद की सुरक्षा कर पाते हैं।





अभी पिछले दिनों भारतीय सेना की महिला अफसरों की पर्वतारोही टीम ने गंगोत्री हिमालय की भगीरथी-2 पर्वत चोटी पर योग कर विश्व कीर्तिमान बनाया है। ये चोटी समुद्र तल से 19,022 फीट पर स्थित है। अलावा इसके पिछले वर्ष सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में 18,800 फीट की ऊंचाई पर योग करने का विश्व रिकार्ड भी जांबाज भारतीय सेना के पास है।

कौशल भारद्वाज

भारतीय सेना तथा सशस्त्र बल केवल शौकिया तौर पर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर ही अभ्यास नहीं करते बल्कि पूरे वर्ष वे इसे अपनी दैनिक चर्या में शामिल कर करते रहते हैं। कुछ वर्ष पहले कुछ सैनिकों को योग का प्रशिक्षण दिया गया था जिसके परिणाम सकारात्मक और सार्थक रहे। इसे ध्यान में रखकर रक्षा विशेषज्ञों ने बाद में अन्य जवानों को योग शिविर के माध्यम से योग साधना सिखाई। इस साधना का मानसिक ऊर्जा पर बेहद सकारात्मक प्रभाव पड़ा। देखा गया कि वे मानसिक रूप से कम तनावग्रस्त पाये गये।

सेना तथा अर्धसैनिक बलों के जवानों-अफसरों में तनाव, दबाव और खिंचाव के बीच हाल के वर्षों में बढ़ी आत्महत्या की प्रवृत्ति में भी योग, प्राणायाम, ध्यान का अभ्यास करने से कमी आई है। सेना में अब योग साधना (सहज योग) और सूर्य नमस्कार काफी लोकप्रिय है। विशेषरूप से बर्फीले इलाके में तैनात सैनिक अधिक शारीरिक ऊर्जा खर्च किए बगैर योगाभ्यास कर रहे हैं।

इंटरव्यू:  सैनिक की कुशलता को बढ़ाता है विपश्यना ध्यान- कौशल भारद्वाज

भारतीय सेना ने योग-ध्यान की महत्ता को जान-समझकर पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर के बड़गाम में 27 जुलाई-7अगस्त (2017) की अवधि में दस-दस दिवसीय दो विपश्यना ध्यान शिविरों का आयोजन किया था। तत्कालीन कमांडिग अफसर मनीष गर्ग के नेतृत्व में इंजीनियरिंग कोर-118 ने इन शिविरों को करने की जिम्मेदारी संभाली थी जिसमें क्रमशः 50 तथा 54 सैन्यकर्मियों ने उत्साह और मनोयोग से हिस्सा लिया था। इन शिविरों के आचार्य थे कौशल कुमार भारद्वाज। वह पिछले 32 वर्षों से विपश्यना के साधक और आचार्य हैं। सेना के इन ध्यान शिविरों से हुए लाभ, चुनौतियां, मौसम संबंधी रुकावट आदि पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रस्तुत हैं बातचीत के खास अंशः

प्रश्नः सैनिकों के लिए क्यों जरूरी है योग और ध्यान?

उत्तरः ध्यान ही योग है। योग और ध्यान तन+मन+बुद्धि के स्तर पर कार्य करता है। जब इनका सम्मिश्रण हो जाता है तो सैनिक और अधिक कुशलता से अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। भारतीय सेना तथा सशस्त्र बल जाबांज और पराक्रमी हैं। पर ध्यान योग के निरंतर अभ्यास से उनमें पांच बातें विकसित हो जायेंगी। (1) तन निरोग (2) मन स्थिर (3) बुद्धि विकसित (4) सामाजिक समरसता और (5) आध्यात्मिक उन्नति। उसके बाद तो ये विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेना होगी।

प्रश्नः सैनिक तो वैसे भी फिटनेस से भरपूर तथा अनुशासन के अभ्यस्त होते हैं। फिर योग क्यों?

उत्तरः वे केवल शरीर से स्वस्थ होते हैं। बुद्धि व मन की सीमा होती है। पर विपश्यना ध्यान मन की सीमाएं तोड़ता है। एक बार शिविर कर लेने के बाद निरंतर अभ्यास से मन के राग-द्वेष समाप्त हो जाते हैं। और मन उचित दिशा की ओर बढ़ने लगता है।

प्रश्नः हाल के वर्षों में सेना तथा अर्धसैनिक बलों के जवानों-अफसरों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके निदान में कितनी कारगर है विपश्यना ध्यान पद्धति?

उत्तरः सौ प्रतिशत। मन की गांठों को खोलने के बाद और लगातार ध्यान का अभ्यास करने से शरीर व मन के स्तर पर वैज्ञानिक ढंग से बदलाव आता है। औऱ मन सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। ऐसा सेना व जयपुर सेंट्रल जेल, नासिक तथा तिहाड़ जेल आदि के ध्यान शिविरों में देखा गया है।

प्रश्नः ऊंचाई पर स्थित किसी शिविर में ऑक्सीजन की कमी संबंधी कोई दिक्कत आई हो?

उत्तरः अभी तक बड़गाम (जम्म-कश्मीर) में ही सेना के इन दो ध्यान शिविरों का आयोजन हुआ है। यहां पर कोई परेशानी नहीं आई। वैसे भी तिब्बत जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में विपश्यना ध्यान शिविर सहज रूप से होते रहते हैं।

प्रश्नः आप नई दिल्ली स्थित तिहाड़ सेंट्रल जेल में विपश्यना ध्यान के कई शिविर निर्देशित कर चुके हैं। कोई अनुभव?

उत्तरः यहां दस दिवसीय छह-सात शिविरों में प्रशिक्षण दे चुका हूं। शिविर के दौरान और बाद में कैदी साधकों ने बताया कि उनमें सकारात्मक बदलाव आया। उम्र कैद की सजा पाए कैदियों में प्रतिशोध लेने, बेचैनी, घबराहट और गुस्से में कमी आई।

प्रश्नः देश की अन्य जेलों में क्या इस तरह के शिविर आयोजित किए जा रहे हैं?

उत्तरः हां, जयपुर सेंट्रल जेल, वड़ोदरा सेंट्रल जेल में दस दिवसीय ध्यान शिविरों का आयोजन हो रहा है जिसका स्थायी लाभ जेल बंदियों को मिल रहा है।

प्रश्नः क्या तनाव तथा अवसाद की ओर बढ़ रहे अर्धसैनिक बलों व पुलिस के जवानों के लिए ऐसे ध्यान शिविरों का आयोजन करना चाहिए?

उत्तरः विपश्यना जीवन जीने की कला सिखाती है। चाहे आप सरहद पर हों या समाज में। हर कर्तव्य पालन में सही, सटीक, कारगर ढंग से करने का रास्ता सुझाती है विपश्यना। यहां हमें  समझना होगा कि योग लौकिक साधना है जबकि विपश्यना पारलौकिक। चूंकि इसमें आलंबन संवेदना को लिया जाता है जो क्लेश को जड़ से उखाड़ फेंकती है।

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