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यह था असली ‘टाइगर’..जासूस जो पाक सेना में बना मेजर, उड़ा दी थी पाकिस्तान की नींद

रविंद्र कौशिक

हाल ही में सलमान खान की फिल्म ‘टाइगर जिन्दा है’ रिलीज हुई है और बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई भी कर रही है। आपको बता दें कि ये फिल्म ‘एक था टाइगर’ का दूसरा भाग है। ये फिल्म एक जासूस ‘टाइगर’ के इर्द गिर्द घूमती है। लेकिन क्या आप जानते हैं असल जिन्दगी में ‘टाइगर’ कौन था ? शायद आप यह न जानते हों लेकिन जासूसी की रहस्यमय दुनिया का वह ‘टाइगर’ जिसने पाकिस्तानी सेना की नाक के नीचे काम करते हुए उसकी नींद उड़ा रखी थी। ऐसे ही रॉ एजेंट जासूस ‘ब्लैक टाइगर’ के बारे में आइये आपको बताते हैं।





रॉ एजेंट रवींद्र कौशिक जो एक थियेटर में कलाकार थे। वह न सिर्फ भारत के लिए जासूसी करने पाकिस्तान गए बल्कि उन्होंने पाकिस्तानी सेना में मेजर तक का पद हासिल कर दिया। कहा जाता है कि 1979 से 1983 तक पाकिस्तानी सेना में रहते हुए उन्होंने भारत को बहुत सी अहम जानकारियां उपलब्ध कराईं। तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने उनके कार्य से प्रभावित होकर उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ का खिताब दिया।

माना जाता है कि सलमान खान की फिल्म ‘एक था टाइगर’ रवींद्र कौशिक की ज़िंदगी से प्रेरित थी। मगर विडंबना है कि जो जासूस सरकारों के लिए बेहद अहम जानकारियों का ज़रिया होते हैं उन्हें ही वे अक्सर भूल जाते हैं।

लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान रवींद्र कौशिक की मुलाकात भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के अधिकारियों से हुई। उन्होंने उनका काम देखते हुए रवींद्र को नौकरी का प्रस्ताव दिया। वे रवींद्र को पाकिस्तान में खुफिया एजेंट बना कर भेजना चाहते थे। सिर्फ 23 साल की उम्र में वह पाकिस्तान के मिशन पर भेजे गए।

दो साल की ट्रेनिंग के बाद  मिशन पर भेजे गए रवींद्र

वैसे तो पाकिस्तान में ज़िंदगी की जंग हारने वाले सरबजीत को लेकर भले ही ये विवाद रहा हो कि वह भारत के जासूस थे या नहीं!  मगर ये मामला जासूसी की रहस्यमयी दुनिया की तरफ ध्यान खींचता है। ये जासूस सरकारों के लिए बेहद अहम जानकारी का जरिया होते हैं। रवींद्र कौशिक जैसे जासूस अपनी जान पर खेल इस खतरनाक काम को अंजाम देते हैं। आपको बता दें कि पाकिस्तान जाने से पहले दिल्ली में करीब दो साल तक रविन्द्र को ट्रेनिंग दी गई। उन पर वहां किसी भी तरह का शक न हो, इसलिए इस्लामिक संस्कार के मुताबिक उनका खतना भी कराया गया। उर्दू, इस्लाम और पाकिस्तान के बारे में जानकारियां दी गईं। पंजाबी बोलने वाले श्रीगंगानगर के इस जासूस को पाकिस्तान में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि वहां के ज्यादातर इलाकों में पंजाबी बोली जाती है।

भारत पहले से चीन और पाकिस्तान की आंखों की किरकिरी बना हुआ था। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तान नए हमले की तैयारी करने में लगा हुआ था। 1975 में रवींद्र को पाकिस्तान भेजा गया। वहां उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया। नबी अहमद शाकिर नाम से पाकिस्तान की नागरिकता लेने वाले और कानून से ग्रेजुएशन करने के बाद वह पाकिस्तानी सेना में भर्ती हो गए। सेना में उन्हें प्रमोशन देते हुए मेजर रैंक दिया गया।

कई बार पाकिस्तान के मंसूबों पर फेरा पानी

उन्होंने स्थानीय लड़की अमानत से प्यार करने के बाद शादी कर ली, उन्हें एक बेटी भी हुई। उन्होंने अपनी जिंदगी के करीब 30 साल परिवार से दूर ऐसे मुल्क में गुजारे, जहां के हालत एकदम उलट थे। कई बार पाकिस्तान राजस्थान की सीमा से हमला करने का मंसूबा बनाता था, लेकिन अहम जानकारी भारत को पहले ही मिल जाने से यह पाक के लिए मुमकिन नहीं हो पाता था।

1983 में रवींद्र कौशिक से मिलने रॉ ने एक और एजेंट पाकिस्तान भेजा। लेकिन वह पाकिस्तान खुफिया एजेंसी के हत्थे चढ़ गया। लंबी यातना और पूछताछ के बाद उसने रवींद्र के बारे में सब कुछ बता दिया।

रवींद्र को गिरफ्तार कर सियालकोट की जेल में डाल दिया गया। पूछताछ में लालच और यातना देने के बाद भी उसने भारत की कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। 1985 में उसे मौत की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में उम्रकैद में बदला गया। मियांवाली जेल में 16 साल कैद काटने के बाद 2001 में उनकी मौत हो गई।

रविन्द्र के पिता इंडियन एयरफोर्स में अफसर थे। रिटायर होने के बाद वह टेक्सटाइल मिल में काम करने लगे। रवींद्र ने जेल से कई खत अपने परिवार को लिखे। जिनमें उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों की एक लम्बी दास्तां थी। अपने पिता को लिखे एक खत में उन्होंने अपने पिता से पूछा था कि ‘क्या भारत जैसे बड़े मुल्क में कुर्बानी देने वालों को यही सिला मिलता है?’

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