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सेना के इस 71 वर्ष के कैप्टन ने 3,500 युवाओं की बदल दी जिंदगी, देते हैं फिजिकल ट्रेनिंग

कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे

नई दिल्ली। कहा जाता है कि आपका जोश और जज्बा बढ़ती उम्र को आप पर हावी नहीं होने देता है। जी हां, 71 साल के आद्या प्रसाद दुबे के लिए भी यही कहा जा सकता है। उनमें अाज भी वह जज्बा और जोश दिखाई देता है जैसा 1964 में भारतीय सेना में बहाल होते हुए था। लंबी सेवा के बाद वर्ष 1992 में बतौर कैप्टन आद्या भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए। सेवा निवृत्त होने के बाद भी वह देश सेवा में लगे हुए हैं। गोरखपुर जिले के मीठाबेल गांव में हर रोज उनकी सुबह शुरू होती है छह बजे एक कैंप से। इस कैंप में सैकड़ों युवा इकट्ठा होते हैं। कैप्टन दुबे के निर्देशों पर युवा दौड़ते हैं, कूदते हैं फांदते हैं। कैप्टन में लड़कियां भी भाग लेती हैं।





हैरान करने वाली बात यह कि पिछले 23 साल से चल रहे कैप्टन के इस कैंप से निशुल्क ट्रेनिंग ले चुके करीब 3,500 युवा देश की सेवा के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों से जुड़ चुके हैं। दो दर्जन लड़कियां भी सीआरपीएफ और पुलिस में सेवारत हैं। ऐतिहासिक चौरीचौरा से करीब 30 किलोमीटर दूर मीठाबेल के रहने वाले कैप्टन आद्या प्रसाद की तैनाती जबलपुर, गोवा, बारामुला, लेह में रही। सेवानिवृत्त होने के बाद गांव में खेती-बाड़ी संभाली।

कैप्टन आद्या जब एक दिन सुबह सैर करने निकले तो गांव के पास बाग में लड़कों को जुआ खेलते देख काफी दुखी हुए। उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि गांव के लड़कों के भविष्य के लिए कुछ ऐसा करना होगा जिससे उन युवाओं की जिंदगी संवर जाए। और फिर उन्होंने एक नेट व वॉलीबॉल खरीदी और अगले दिन खाली पड़े मैदान में जुआ खेलने वाले लड़कों को लेकर निकल पड़े। शुरुआत में गांव के युवाओं का रूझान कम था।  लेकिन उन्होंने लड़कों को फिजिकल ट्रेनिंग देना शुरू किया और धीरे-धीरे कैप्टन की मेहनत रंग लाने लगी। कैंप के दो लड़कों ने आसानी से न सिर्फ फिजिकल टेस्ट पास किया बल्कि सेना में भर्ती भी हुए।

कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे ने कहा कि गांव के बच्चे गलत दिशा में जा रहे थे। बच्चों के पास अच्छी हाइट के साथ-साथ डिग्री होते हुए भी भविष्य को लेकर कोई ठोस योजना नहीं थी। लिखित परीक्षा की तैयारी कराने के मकसद से सैकड़ों कोचिंग सेंटर गोरखपुर में चल रहे थे, लेकिन फिजिकल ट्रेनिंग कोई नहीं देता था। सेना, पुलिस या अर्धसैनिक बलों की भर्ती में अधिकतर बच्चे फिजिकल नहीं निकाल पाते थे, लिहाजा उनके सपने बिखर जाते थे।

कैप्टन के मुताबिक कैंप में आने वाले अधिकतर बच्चे गरीब परिवार से हैं। गुड़, चना और सूखी रोटी की बदौलत यहां दो घंटे पसीना बहाकर और अनुशासन का पाठ सीखकर काबयाबी हासिल करते हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके कैंप से करीब साढ़े तीन हजार बच्चों को रोजगार मिला। कैंप से निकलीं सोनी वर्मा सीआरपीएफ व अर्चना जायसवाल सीआईएसएफ में कांस्टेबल हैं, वहीं मीनाक्षी दुबे यूपी पुलिस में हैं। ये लड़कियां बताती है कि अगर कैप्टन नहीं होते तो उनका यह मुकाम हासिल करना मुश्किल था।

 

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