DEFENCE

जो हर मोर्चे पर जवानों को पहुंचाता है चिट्ठियां, ‘सेना डाक सेवा कोर’ की 9 खास बातें

मेरे साथियों अंत समय है, कर दो मुझ पर यह उपकार। मेरे घरवालों को लिख दो, चिट्ठी में बातें दो-चार।
लिख दो, मैंने देश की खातिर अपनी जान गंवाई है। लिख दो, यह तो हर फौजी की सबसे बड़ी कमाई है।
जी हां, ये कोई कल्पना नहीं, उस फौजी की हकीकत है जो युद्ध के मैदान में शहीद हो गए थे। आज टैक्नोलॉजी विकसित हुई तो चिट्ठियों का चलन कम हो गया लेकिन एक वक्त था कि एक चिट्ठी फौजी के लिए अपनों प्रियजनों के साथ होने जैसा एहसास कराती थी। हर फौजी अपने जीवन के हर कठिन मोर्चे पर सीने से लगाए फिरता है क्योंकि घर-परिवार द्वारा हाथों से लिखी चिट्ठी किसी जवान को जो संबल देती है, वह काम कोई और नहीं कर सकता। यही नहीं, शहादत के बाद जवान के बक्से से उसका निजी सामान निकलता है तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है उन्हीं चिट्ठियों का ढेर। आज फोन व इन्टरनेट के प्रयोग ने चिट्ठियों का चलन काफी कम कर दिया है और नतीजन सरकार कई इलाकों में देश की सबसे तेज डाक सेवा को हमेशा के लिए खत्म करने जा रही है। कितनी खास है यह डाक सेवा आइये जानते हैः





सबसे पहले फारस युद्द में भेजे गए थे भारतीय डाकघर

जल्द बंद होगी दुनिया की सबसे तेज डाक सेवा, सैन्य डाक सेवा से जुड़ी खास बातें

इसकी शुरुआत हालांकि 1856 से मानी जाती है, जब एपीएस को सबसे पहले तीव्रगामी सेना के युद्धकालीन समेकित संगठन के तौर पर चालू किया गया था। ये सेना फारस की खाड़ी में बुशायर में सबसे पहले और बाद में कर्इ अन्य ऐसे मिशन पर भेजी गर्इ थी। एपीएस 1947 तक भारतीय सामान्य सेवा का अंग था, जिसे बंद करके एक डाक शाखा के रूप में संबद्ध करके ‘सेना डाक सर्विस कोर’ किया गया था।

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