DEFENCE

…तो इसलिए कमजोर है ‘ख़ाकी’ ये 9 आंकड़े बताते हैं कितनी ‘सशक्त’ है देश की पुलिस ?

अंग्रेजों के दौर में जनता के निगहबान के रूप में खाकी की संकल्पना की गई थी। इसके लिए वर्ष 1861 में अंग्रेजों ने पुलिस कानून की व्यवस्था की और आज भी कमोवेश हमारे देश की पुलिस उसी कानून व्यवस्था के ढर्रे पर दिखाई दे रही है। हालांकि, बीते सालों में विभिन्न कमियों को दूर करने के लिए सुधारों की कवायद की गई। पर आज भी इन सुधारों के लिए बनाई गई तमाम कमेटियां और सिफारिशें सरकारी दफतरों की अलमारियों में पड़ी धूल फांक रही हैं।





आलम यह है कि पुलिस सुधारों की गाड़ी कभी पटरी पर ही नहीं चढ़ पाई। कहीं पुलिस स्टेशनों के पास अपने वाहन नहीं हैं तो कहीं वायरलैस सेट और फोन तक नहीं हैं। एक सर्वे के मुताबिक देश भर के पुलिस के जवान जहां क्षमता से ज्यादा और समय सीमा से अधिक ड्यूटी करते हैं। वहीं 73 फीसदी पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश नसीब नहीं होता। आंकड़े बताते हैं कि तकरीबन 30 प्रतिशत पुलिसकर्मी दिन भर में तकरीबन 14 घंटे से भी अधिक समय तक ड्यूटी करते हैं। आज हम ऐसे ही कुछ आंकड़ों पर नजर डाल रहे हैं जो बताते हैं कि एक विशाल जनतंत्र की सुरक्षा करने वाली हमारे देश की पुलिस आखिर कितनी मजबूत और कितनी स्मार्ट है –

 पुलिस बल की स्वीकृत क्षमता

पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो पूरे देश में  पुलिस बल की स्वीकृत क्षमता तकरीबन 20 लाख है।

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