DEFENCE

स्पेशल रिपोर्टः घटते रक्षा खर्च पर समिति ने जताई चिंता, कहा- रक्षा तैयारियों में ढील न दे भारत

ब्रह्मोस मिसाइल

नई दिल्ली। संसद की स्थायी समिति ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में भारत के घटते रक्षा खर्च पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि रक्षा तैयारी में यह ढील देश की सुरक्षा के लिये ठीक नहीं है।





सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में इस समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद से भारत का रक्षा खर्च सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में न्यूनतम पर आ गया है। सेनाओं की तैयारी-रक्षा उत्पादन और खरीद विषय पर गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2014-15 में भारत का रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 2.06 प्रतिशत था जो घट कर 2017-18 में 1.56 प्रतिशत पर रह गया है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भारत जैसे बड़े आकार वाला देश रक्षा तैयारी में ढील नहीं दे सकता। समिति ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि भारत का समुद्र तट 7500 किलोमीटर लम्बा है और इसकी जमीनी सीमाएं 15,000 किलोमीटर लम्बी हैं। इसमें 3,323 किलोमीटर सीमा पाकिस्तान से लगती है और 3,380 किलोमीटर सीमा चीन के साथ लगती है।

समिति ने इस बात पर निराशा जाहिर की कि देश में ही रक्षा साज सामान के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये अपनाई गई सामरिक साझेदारी नीति को व्यवहार में लाने के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसमें यह सोचा गया था कि सेनाओं के लिये जरूरी बड़े हथियार और हथियार मंचों का उत्पादन देश में ही भारतीय प्राइवेट कम्पनियां विदेशी कम्पनियों के सहयोग से बनाएंगी। इसके तहत लड़ाकू विमान,  युद्धपोत और पनडुब्बियां आदि देश में ही निर्माण करने की परिकल्पना की गई थी। सरकार ने इस नीति की घोषणा मई, 2017 में की थी। समिति ने कहा कि भारत की पश्चिमी,  उत्तर पश्चिमी,  उत्तरी,  उत्तर पूर्वी सीमाओं पर हालात काफी अस्थिर चल रहे हैं जिसके मद्देनजर भारत की रक्षा तैयारी को लगातार ऊंचे स्तर पर बनाए रखना चाहिये।

हथियारों के स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति और स्वदेशीकरण के स्तर पर टिप्पणी करते हुए समिति ने कहा कि कुछ उपलब्धियों के बावजूद भारत की रक्षा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर ही निर्भर है। रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग ने समिति को जानकारी दी कि कुल सैन्य जरूरतों का 40 प्रतिशत ही देश के रक्षा कारखानों से हासिल होता है। इसके मद्देनजर समिति ने चिंता जाहिर की कि आपात स्थिति में भारतीय सेनाएं परेशानी में पड़ सकती हैं क्योंकि वे अपनी संवेदनशील जरूरतों के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर रहेंगी जो भारत पर दबाव बनाने के लिये कभी भी सहयोग रोक सकती हैं।

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