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स्पेशल रिपोर्ट: जम्मू-कश्मीर पर ऐतिहासिक फैसला

भारतीय सेना

ऩई दिल्ली। जम्मू कश्मीर को भारत से जोड़ने वाली संविधान की विशेष धारा 370 को निरस्त कर नरेन्द्र मोदी की सरकार के फैसले को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़ कर व्यापक समर्थन मिला है। तीन भिन्न भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले इलाकों को जोड़ कर एक प्रदेश जम्मू-कश्मीर का गठन अप्राकृतिक ही था जिसे 150 साल बाद भंग करने की हिम्मत भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने शासन के दूसरे कार्यकाल में दिखाई है। लद्दाख मुख्य तौर पर बौद्ध बहुल, जम्मू हिंदू बहुल और कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका कहा जा सकता है जिसके लिये अब अलग केन्द्र शासित प्रशासन होंगे।





लेकिन इस फैसले के बाद जम्मू कश्मीर में जो हालात पैदा होने की शंका पैदा की जा रही है उससे निबटना केन्द्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगा। मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है और यह ऐतिहासिक फैसला लेने की चुनौती से भी बड़ी चुनौती खासकर श्रीनगर के इलाके में सम्भावित हिंसा को काबू में रखने की होगी। केन्द्र सरकार को जल्द से जल्द ऐसी योजनाएं और घोषणाएं कश्मीर के इलाके के लिये करनी होगी जिससे वहां के लोगों को भरोसा जीता जा सके।

जम्मू-कश्मीर के तीनों इलाकों के बीच कभी भी भावनात्मक एकता नही रही। श्रीनगर की मुखर आबादी की वजह से देश औऱ सरकार के अलावा पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान कश्मीर इलाके पर ही रहता था। मोदी सरकार ने एक ही झटके में इस विभाजन को दूर किया और तीनों को स्वतंत्र दर्जा देकर तीनों इलाकों की जनता में स्वशासन का सुनहरा मौका प्रदान किया है। जम्मू कश्मीर राज्य के लिये केन्द्र से हजारों करोड़ का जो भी अनुदान जाता था उसे कश्मीर के राजनीतिक्ष औऱ राज्य का नौकरशाही तबका हथिया लेता था। आम जनता तक यह अनुदान पहुंच ही नहीं पाता था।

इसलिये इस फैसले का जहां लद्दाख के बौद्ध इलाकों में व्यापक स्वागत होगा वहीं जम्मू इलाके के लोग भी खुश होंगे। अब उनके मन में यह भावना नहीं होगी कि कश्मीर के लोग दादागिरी दिखाकर उन पर शासन कर रहे हैं और विकास औऱ लोगों के कल्याण के लिये आया धन केवल कश्मीरी लोग ही हड़प जा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के इलाके को दो केन्द्र शासित प्रदेश में बांट देने के केन्द्र सरकार के फैसले का देश और दुनिया की राजनीति पर भी दूरगामी असर पड़ने वाला है। जम्मू-कश्मीर के एक तिहाई इलाके को 1948 में पाकिस्तान द्वारा हथियाया गया तो उसमें गिलगिट औऱ बालतिस्तान के इलाके भी थे जिन्हें पाकिस्तान ने भी अपने हिस्से वाले कथित आजाद कश्मरी के शासन से निकाल कर सीधे इस्लामाबाद के तहत ला दिया। इसी तरह भारत ने भी अपने हिस्से वाले जम्मू कश्मीर के इलाके को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांट देने से नई राजनीतिक स्थिति पैदो होगी। जम्मू कश्मीर के राजनीतिक खिलाड़ियों के लिये पूरी तरह एक नई पिच मोदी सरकार ने बना दी है जिसपर जम्मू कश्मीर के राजनीतिक खिलाड़ियों को होड़ करनी होगी।

पाकिस्तान ने भले ही मोदी सरकार के इस फैसले की निंदा की हो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भारत ने एक जम्मू कश्मीर मसले का एक नया भौगोलिक औऱ राजनीतिक पैमाना पेश कर दिया है जिसके दायरे में भारत के लिये राज्य के तीनों केन्द्र शासित इलाकों पर केन्द्र द्वारा नियुक्त प्रशासक यानी लेफ्टिनेंट गर्वरनरों के लिये शासन करना आसान तो होगा लेकिन इसे आसान बनान के लिये मोदी सरकार को बेहद सोचसमझ कर भरोसा पैदा करने वाले कदम उठाने होंगे।

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