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‘आज़ाद हिन्द फौज’ पर लाल किले में चले मुकदमे से जुड़ी 6 खास बातें

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिन्द फौज (indian national army) की अहम भूमिका रही है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज के रणबांकुरों ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये थे। वह तो खराब मौसम और जापान से रसद की सप्लाई रूकने की वजह से आजाद हिन्द फौज को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा, वरना भारत 1947 से पहले ही आजाद हो गया होता। नेताजी की एक सोच यह भी थी कि जब भारतीयों को आजाद हिन्द फौज के प्रयासों का पता चलेगा तो देश अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा होगा लेकिन अखबारों पर सेंसर की वजह से नेताजी के बहादुर सिपाहियों के कारनामों के बारे में जनता को पता नहीं चल पाया। आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को अंग्रेजों ने जब गिरफ्तार किया और उन पर मुकदमे की प्रक्रिया शुरू की तो तो लोगों को उनकी बहादुरी के किस्सों के बारे में पता चला। पूरा देश आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के पक्ष में खड़ा हो गया। अंग्रेजों को आभास हो गया है कि अब उनका भारत में रूकना संभव नहीं है। जल्द ही देश स्वतंत्र हो गया। नेताजी के जन्म दिवस के अवसर पर आज हम आपको बता रहे हैं आजाद हिन्द फौज और उसके बहादूर सिपाहियों पर चले मुकदमे के बारे में खास बातें।





 इन सैनिकों से मिलकर बनीं थी यह फौज

आज़ाद हिन्द फौज विश्वयुद्ध में भारतीय युद्ध बंदियों को शामिल कर बनाई गई थी। इसकी स्थापना दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की मदद से से सिंगापुर में हुई थी। वर्ष 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व से इस फौज में नई जान आ गई। उनका मकसद अन्य देशों की सहायता से भारत को आज़ादी दिलाना था। उनके नेतृत्व में मलेशिया व बर्मा के बहुत से रिहा युद्धबंदी और वहां के नागरिक इससे जुड़ गए।

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