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इंदिरा को ये गारंटी सिर्फ फील्ड मार्शल मानेकशा ही दे सकते थे!

सैम मानेकशा
  • जयंती विशेष

नई दिल्ली: सिखों की आस्था का विशेष केन्द्र अमृतसर। बहुत कम लोग जानते हैं कि सेना के दूसरे भारतीय फील्ड मार्शल का खिताब पाने वाले सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशा का जन्म इसी धर्मनगरी में हुआ था। वह दिन था 3 अप्रैल 1914 का। पिता होर्मूसजी मानेकशा की तरह सैम को भी डॉक्टर बनाना चाहते थे क्योंकि वह खुद भी ब्रिटिश सेना में डॉक्टर थे।





पंजाब के बाद नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में पढ़ाई पूरी करने के बाद महज 15 साल की उम्र में पढ़ाकू सैम ने लंदन जाकर स्त्री रोग विशेषज्ञ बनने की इच्छा जाहिर की लेकिन छोटी उम्र का हवाला देकर उन्हें रोक दिया गया। इस पर गुस्से में आकर सैम ने IMA की परीक्षा दी और इसमें चुन भी लिए गए। पन्द्रह उम्मीदवारों में उनका छठा नंबर रहा। सैम की तैनाती गोरखा रेजिमेंट में हो गई। पहली फरवरी 1935 को वह सेकंड लेफ्टिनेंट बने लेकिन उनकी वरिष्ठता एक साल पहले यानि 4 फरवरी 1934 तय की गई।

सैम मानेकशा जवानों और अन्य अधिकारियों के साथ

चालीस साल के फौजी जीवन में सैम ने पांच युद्धों में हिस्सा लिया जिसमें दूसरा विश्वयुद्ध भी शामिल है। इसी युद्ध में वह गोलियां लगने से बुरी तरह जख्मी भी हुए और जब उन्हें रणक्षेत्र से एक आस्ट्रेलियन डॉक्टर के पास ले जाया गया तो सैम ने कहा कि मुझे एक खच्चर ने दुलत्ती मारी है। जख्म ठीक होने के साल भर के बाद ही सैम फिर मोर्चे पर जा पहुंचे। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने पर 60 हजार जापानी युद्धबंदियों का कैम्प उन्होंने बखूबी संभाला। 1946 में आस्ट्रेलिया से लेक्चर टुअर से लौटने पर उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल बना दिया गया।

PHOTO: जोर का झटका धीरे से देते थे सैम मानेकशा

1947 के अंत में जब पाकिस्तानी कबायलियों ने जम्मू कश्मीर पर हमला किया तो वहां के शासक महाराजा हरि सिंह ने भारतीय फौज की मदद मांगी। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की शर्त के साथ ये मदद दी और कबायलियों और पाकिस्तानी सेना को मुंह की खानी पड़ी। पूरी रणनीति में सैम मानेकशा का अहम रोल रहा। इसके बाद मानेकशा को सैन्य ऑपरेशन का पहला भारतीय निदेशक नियुक्त किया गया। इस ओहदे को अब Director General Military Operation (DGMO) कहा जाता है।

सैम मानेकशा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ

1969 में तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह की राय के खिलाफ जाकर सरकार ने मानेकशा को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया, जबकि लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह उनसे सीनियर थे। बेबाक और बेखौफ मानेकशा किसी की भी परवाह नहीं करते थे। हालांकि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेहद करीब माना जाता था लेकिन 1971 के युद्ध से पहले उन्होंने अपने इस्तीफे तक की पेशकश कर डाली थी। इसके बाद उन्होंने युद्ध जीतने की गारंटी दी और कर दिखाया। वह भी तय तारीख से पहले। 90 हजार पाकिस्तानी फौजी युद्धबंदी बनाए गए और बांग्लादेश का गठन हो गया।

1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारी संख्या में पाकिस्तान के सैनिकों ने सरेंडर किया था

इस युद्ध की समाप्ति पर इंदिरा गांधी मानेकशा को फील्ड मार्शल का रैंक देकर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाना चाहती थीं लेकिन अफसरशाही की सलाह की वजह से ऐसा नहीं किया जा सका। आखिर वह दिन भी आ गया। वह दिन था 3 फरवरी 1973 जब मानेकशा को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में फील्ड मार्शल का ओहदा दिया गया। इससे पहले उनकी सेवानिवृति की तारीख छह महीने बढ़ाई गई।

मिसाइल मैन और देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम फील्ड मार्शल सैम मानेकशा से मिलते हुए। यह तस्वीर उन दिनों की है जब मानेकशा बीमार थे।

मानेकशा का नाम कई विवादो में भी जुड़ा रहा और फिर 94 साल की उम्र में वह इस दुनिया से कूच कर गए। तमिलनाडु में 27 जून 2008 का सूर्य उनके लिए आखिरी दिन लेकर आया।

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