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अब मिली पहली स्कॉर्पिन सीरीज की पहली पनडुब्बी कलवरी

आईएनएस कलवरी

नई दिल्ली। लंबे इंतजार के बाद नौसेना को स्कॉर्पिन सीरीज की पहली पनडुब्बी कलवरी हासिल हो गई है। भारतीय नौसेना अगले महीने एक समारोह में इसे अपने बेड़े में शामिल करने की तैयारी में है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर नौसेना की मौजूदा पनडुब्बियां पुरानी पड़ रही हैं। इन परिस्थितियों में आधुनिक फीचर्स से लैस यह पनडुब्बी मिलना महत्वपूर्ण है। मेक इन इंडिया के तहत बनी पनडुब्बी दुश्मन की नजरों से बचकर सटीक निशाना लगा सकती है। ये एंटी शिप और टॉरपीडो से हमले करने में सक्षम है।





नौसेना में शामिल हुई शिशुमार पनडुब्बी

नौसेना के बेड़े में फिलहाल शिशुमार क्लास (जर्मन) की 4 छोटी, जबकि सिंधुघोष क्लास (रूस) की 9 बड़ी पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें ज्यादातर 25 साल की औसत उम्र को पार कर चली हैं। बताते हैं कि आधी पनडुब्बियां ही एक समय में एक साथ ऑपरेशनल मिलेंगी। अब स्कॉर्पिन सीरीज की कुल 6 पनडुब्बियां देश में बनाने का प्लान है।

कलवरी का नाम टाइगर शार्क पर रखा गया है। कलवरी के बाद दूसरी पनडुब्बी खंदेरी का समुद्र में मूवमेंट जून में शुरू हो गया था। अगले साल इसे नौसेना में शामिल किया जाएगा। तीसरी पनडुब्बी वेला को इसी साल पानी में उतारा जाएगा। बाकी पनडुब्बियों को 2020 तक शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

भारत में 1999 में तैयार प्लान के मुताबिक 2029 तक 24 पनडुब्बियां बनाने की योजना बनी। पहले प्रॉजेक्ट P75 के तहत स्कॉर्पिन क्लास की 6 पनडुब्बियों का निर्माण शुरू हुआ। अगले प्रॉजेक्ट P75i के तहत स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप मॉडल के दायरे में 6 पनडुब्बियां बनेंगी, जिसमें कोई प्राइवेट भारतीय कंपनी किसी विदेशी भागीदार के साथ मिलकर काम करेगी। हालांकि इसका टेंडर जारी होने में वक्त लग सकता है। चीन के पास 60-70 पनडुब्बियां बताई जाती हैं।

प्रॉजेक्ट में हुई देरी

स्कॉर्पिन पनडुब्बियों का प्रॉजेक्ट मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिप बिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) और फ्रांस की कंपनी नवल ग्रुप (पूर्व में डीसीएनएस) के सहयोग से चलाया जा रहा है। फ्रांसीसी कंपनी टेक्नॉलजी ट्रांसफर भी करेगी। यह प्रॉजेक्ट 5 साल लेट हो चुका है। 2005 में रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस की कंपनी DCNS से 23,652 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था।

कलवरी को 2012 में ही नौसेना में शामिल करने का प्लान था। सूत्रों के मुताबिक यह फैसला किया जा चुका है कि ऑपरेशनल नजरिये से पूरी तरह तैयार पनडुब्बी को ही नौसेना को सौंपा जाएगा, जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। यही वजह है कि कलवरी के इंडियन नेवी में शामिल होने में देरी हुई है।

स्कॉर्पिन क्लास की पनडुब्बियों का डेटा लीक होने की रिपोर्ट पिछले वर्ष अगस्त में सामने आई थी। इसके बावजूद कलवरी का ट्रायल जारी रहा। यह माना गया था कि डेटा भारत से लीक नहीं हुआ। कुछ समय पहले नौसेना ने कलवरी से एंटी शिप मिसाइल की पहली बार फायरिंग की, जो सफल बताई गई। ट्रायल में कलवरी का डीप डाइव टेस्ट भी सफल रहा, जिससे पता चलता है कि वह गहराई में पानी के वजन का प्रेशर झेल सकती है। सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम वैक्यूम टेस्टिंग का काम एक ही दिन में एक ही बार में पूरा हो हो गया। इसमें यह देखा जाता है कि बाहरी हवा पनडुब्बी भीतर न आ सके।

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