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…और कुछ इस अंदाज से बदलती रही भारत की घुड़सवार सेना

भारत की घुड़सवार सेना का इतिहास

नई दिल्ली: मशीनी युग से पहले हर सेना के लिए सबसे ज्यादा अहमियत घुड़सवार सेना और घोड़ों की ही रहती थी। लेकिन हाल ही में हुई एक और घटना ने इनकी अहमियत सबके सामने ला दी। …और यह था भारतीय सेना के प्रमुख जनरल बिपिन सिंह रावत का नेपाली सेना को सात घोड़ों को तोहफे के तौर पर देना। व्यवहारिक तौर से न सही लेकिन कुछ देशों ने सेना में ऐतिहासिक गौरव के प्रतीक के तौर पर अश्वरोही सेना का वजूद अब भी कायम रखा हुआ है। परम्परागत सैन्य समारोहों के अलावा इनका इस्तेमाल पोलो या कुछ और खेलों में होता है।





तस्वीरों में भारत की घुड़सवार सेना का इतिहास

मिस्र युद्ध के दौरान 1882 में काहिरा जाते हुए भारतीय घुड़सवार दल

भारत उन गिने चुने देशों में से है जिन्होंने अब भी घुड़सवार सेना की परम्परा को बेहद खूबसूरती से न सिर्फ सहेज कर रखा हुआ है बल्कि व्यावहारिता भी बनाकर रखी है।

तस्वीरों में भारत की घुड़सवार सेना का इतिहास

पहले विश्व युद्ध में लड़ने का आदेश मिलने के बाद भारतीय घुड़सवार दल

आजादी के समय यानि 1947 में भारत में जो घुड़सवार सेना बची थी उसमें या तो राष्ट्रपति (पहले वायसरॉय) के अंगरक्षक थे या फिर अलग-अलग रियासतों की तरफ से उपलब्ध कराए गए घुड़सवार सैनिकों को मिलाकर गठित इम्पीरियल सर्विस स्टेट फोर्सेस। 1951 में रियासतों के विलय के बाद, नियमित भारतीय सेना में, घुड़सवार सेना का पुनर्गठन करके ग्वालियर लांसर, द जोधपुर हॉर्स, मैसूर लांसर्स और B स्क्वाड्रन, दूसरी पटियाला लांसर्स बनाई गई। दो साल बाद यानि 1953 में इन सबको विलय करके एक रेजिमेंट बनाई गई।

तस्वीरों में भारत की घुड़सवार सेना का इतिहास

पहले विश्व युद्ध के दौरान में मैदान में भारतीय दल

1 अक्टूबर 1953 को न्यू हॉर्स्ड कैवेलरी रेजिमेंट के नाम से इसकी स्थापना ग्वालियर में की गई। जम्मू कश्मीर स्टेट फोर्सेस के लेफ्टिनेंट कर्नल फुलेल सिंह इसके पहले कमांडेंट थे। जनवरी 1954 में इसे नया नाम 61वी कैवेलरी (घुड़सवार सेना) दिया गया।

तस्वीरों में भारत की घुड़सवार सेना का इतिहास

इन्डियन कैवलरी कोर के मुख्यालय के बाहर सर प्रताप सिंह। 1902 से 1911 तक हिम्मतनगर के महाराजा रहे लेफ्टीनेंट जनरल प्रताप सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे।

खास बात ये है कि इस रेजीमेंट में सिर्फ राजपूत, मराठा और कायमखानी सैनिकों को ही शामिल किया जाता है और वो भी बराबर अनुपात में। कहा जाता है कि ऐसा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निर्देश के बाद से ही किया जा रहा है। कायमखान वो लोग हैं जिन्होंने 14वीं सदी में इस्लाम कबूल किया था और 1384 से 1731 तक राजस्थान के फतेहपुर पर राज किया।

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