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सेना में समलैंगिक संबंधों अनुमति नहीं: आर्मी चीफ

सेना प्रमुख बिपिन रावत

नई दिल्ली।  समलैंगिक  सम्बन्ध और विवाहेत्तर रिश्तों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में पूछे जाने पर यहां थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने संकेत दिया कि इसे थलसेना में लागू करना मुमकिन नहीं होगा। जनरल रावत ने कहा कि वह अपनी सेना को रुढ़िवादी मानते हैं।





यहां 15 जनवरी को मनाये जाने वाले  थलसेना दिवस के मौके पर जनरल बिपिन रावत ने मीडिया से बातचीत में  कहा कि  थलसेना देश के कानून से ऊपर नहीं है लेकिन समलैंगिक सम्बन्धों को सेना में अनुमति नहीं दी जा सकती। जनरल रावत ने यह भी कहा कि जब कोई नागरिक सैन्य सेवा में भर्ती होता है तो उसके कुछ नागरिक अधिकार ले लिये जाते हैं। जनरल रावत से  158 साल पुरानी  भारतीय दंड संहिता की धारा  377 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में पूछा गया था।

गौरतलब है कि पिछले साल सितम्बर में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की पीठ ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराधिक दायरे से बाहर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इससे समानता के अधिकारों का हनन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल विवाहेत्तर सम्बन्धों को अपराध की श्रेणी में डालने वाले कानून को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। यह कहते हुए कि थलसेना रुढ़िवादी है औऱ इसे थलसेना में चलते रहने नहीं देना चाहती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू नहीं करने के औचित्य के बारे में थलसेना प्रमुख ने कहा कि सेना के लोग एक विशाल परिवार में रहते हैं और जब कोई सैनिक मोर्चे पर तैनात होता है तब वह अपने परिवार को सैन्य स्टेशनों पर छोड़ जाता है। वहां उनकी देखभाल स्थानीय सैन्य ईकाई करती है। इससे जवान निश्चिंत होकर सीमा पर अपने देश की रक्षा का दायित्व निभाते हैं।

सहयोगी सैनिकों की पत्नियों से विवाहेत्तर सम्बन्ध रखने को सेना में उनका प्रेम चुराना कहा जाता है। थलसेना प्रमुख ने कहा कि थलसेना में विवाहेत्तर सम्बन्धों को काफी गम्भीरता से लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आर्मी एक्ट कई साल पहले बना था औऱ तब किसी ने इन बातों को गम्भीरता से नहीं लिया था। उन्होंने कहा कि यह देखना होगा कि हमारा समाज किस तरह समलैंगिक सम्बन्धों औऱ विवाहेत्तर रिश्तों को स्वीकार करता है।

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