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समर नीति : चीन से रिश्ते सामान्य कैसे बनाएं

पिछले साल जून में सिक्किम से सटे भूटान के दावे वाले डोकलाम इलाके में भारत और चीन के सैनिकों के बीच चली तनातनी के बाद अब दोनों देश रिश्तों का तापमान सामान्य करने में जुट गए हैं। जहां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने 12 और 13 अप्रैल को चीन का अघोषित दौरा कर चीन के पोलित ब्यूरो सदस्य यांग च्ये छी के साथ आपसी हितों के सभी दिवपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों पर गहन बातचीत की है। वहीं कुछ दिनों बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज औऱ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण चीन का दौरा करने वाली हैं।





ये सभी उच्चस्तीय दौरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आगामी जून के अंत में चीन दौरे की जमीन तैयार करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक के सिलसिले में चीन के छिंगताओ जाएंगे लेकिन इस दौरान भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सामरिक पर्यवेक्षकों की निगाह प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग से होने वाली मुलाकात पर रहेगी। इस मुलाकात के पहले दोनों पक्षों ने माहौल को सौहार्दपूर्ण बनाने की कोशिश की है। जहां चीन ने भारत के साथ शांति व दोस्ती पर जोर दिया है वहीं भारत ने भी चीन की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रख कर भारत में तिब्बती समुदाय की गतिविधियों पर भारत की आधिकारिक मुहर लगाने से बचने के कदम उठाए हैं।

21 वीं सदी में भारत और चीन दो बड़ी ताकत के तौर पर उभर चुके हैं इसलिये दोनों के बीच रिश्तों का असर विश्व शांति व स्थिरता पर पड़ेगा। इसके मद्देनजर भारत औऱ चीन आपसी रिश्तों को गहरा बनाने पर जोर दे रहे हैं लेकिन जिस तरह चीन के आक्रामक सैन्य कदमों से भारत पर सामरिक दबाव बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर भारत भी जवाबी सैन्य औऱ कूटनीतिक कदम उठा रहा है। सामरिक पर्यवेक्षक कहने लगे हैं कि चीन का रवैया आक्रामक बना रहा तो भारत और चीन के बीच शीतयुद्ध जैसा माहौल बन सकता है। दोनों देशों की सेनाओं की सीमाओं पर तैनाती बढ़ते जाने के मद्देनजर यह भी माना जा रहा है कि छोटी सी चिंगारी आग में घी का काम कर सकती है। राष्ट्रपति शी ने अपना दूसरा कार्यकाल सम्भालने के वक्त यह साफ कर दिया है कि किसी भी कीमत पर वह अपने भूभाग की रक्षा करेगा। दूसरी ओर चीन यदि दक्षिण चीन सागर पर अपना प्रभुत्व बढ़ाता गया और नतीजा के तौर पर दक्षिण चीन सागर से होकर आने-जाने वाले भारतीय व्यापारिक पोतों पर किसी तरह की रोक लगाई गई तो इसका गम्भीर असर भारत-चीन के रिश्तों पर पड़ेगा। भारत ने बार-बार कहा है कि चीन महासागरों में अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का सम्मान और पालन करे। चीन के साथ सौहौर्दपूर्ण रिश्ते बनाने में जहां चार हजार किलोमीटर लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति व स्थिरता बनाए रखना जरूरी है वहीं चीन को यह भी देखना होगा कि हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के इलाके में वह अपना सैन्य और प्रादेशिक प्रभुत्व बढ़ाने वाला कदम नहीं उठाए।

भारत के लिये इनसे निबटना सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा। आने वाले दिनों में भारत के समर नीति निर्धारकों को यही रणनीति बनानी होगी कि इन मसलों पर चीन के विस्तारवादी रवैये पर कैसे काबू पाए। इसके मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी का आगामी चीन दौरा भारत औऱ चीन के रिश्तों की भावी दिशा तय करने वाला साबित होगा।

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