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Silent Heros : जवानों की ही तरह कठिन होती है आर्मी डॉग्स की ट्रेनिंग

army dog squad

आर्मी डॉग्स सशस्त्र बलों का एक अनूठा और प्रमुख हिस्सा हैं। दरअसल, बहुत पुराने समय से ही ये सेना का हिस्सा रहे हैं, लेकिन इन शांत सिपाहियों की तरफ लोगों का ध्यान कम ही जाता है। सेना के डॉग्स का काम दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाने, गोला बारूद की खोज करने से कहीं अधिक होता है। पुराने समय से ही युद्ध के मैदान में जवानों और कुत्ते के बीच एक अद्भुत संबंध रहा है। रेक्स, रॉकेट, रुदाली, मानसी, एलेक्स भी कुछ ऐसे ही आर्मी डॉग्स हैं, जो भारतीय सेना का सिर गर्व से ऊंचा कर चुके हैं। आइए, जानते हैं आर्मी के इन साइलेंट सोल्जर्स से जुडी कुछ रोचक बातें।





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पूरे दिन की ट्रेनिंग के बाद आर्मी डॉग क्वीन अपने हैंडलर सतीश कौशिक के साथ खेलती हुई

सबसे पहले प्रथम विश्व युद्ध में दी थीं सेवाएं

1912 में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया को पुलिस डॉग्स से परिचित कराया था। 1917 में इन्हें सक्रिय रूप से आर्मी में शामिल किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान करीब 53,000 डॉग्स ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया था। इनमे से 20,000 अकेले ब्रिटिश सेना के पास थे। युद्धस्थल में वे घायल सैनिकों को ढूंढना, ड्राइवर अथवा सैनिकों को संदेश व खाना पहुंचाना, चौकीदारी अथवा दुश्मन की स्थिति का पता लगाना जैसे कार्य करते थे।

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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आर्मी डॉग्स

जवानों की तरह ही होता है प्रशिक्षण

अन्य आर्मी सोल्जर्स की तरह ही आर्मी डॉग्स को भी अपने लेवल के कठिनतम प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता हैं, जिनमें से केवल कुछ ही इस ट्रेनिंग को पूरा कर पाते हैं, जबकि अन्य डॉग्स को रिजेक्ट कर दिया जाता है।

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ट्रेनिंग के बाद भी कुत्तों को लगातार एक्टिव रखा जाता है

शौर्यपूर्ण है सैन्य कुत्तों का इतिहास

आर्मी डॉग्स साधारण व पालतू कुत्ते नहीं हैं। उनका इतिहास उनकी बहादुरता की कहानियों से भरा हुआ है। इन्डियन आर्मी की बात करें तो मेरठ के रिमाउंट वेटेरनरी कोर्प्स (RVC) सेंटर को प्राप्त शौर्य चक्र तथा 150 प्रशंसा पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि आर्मी डॉग्स की ये कोर कितनी बहादुर और सेना के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।

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गणतंत्र दिवस परेड से पूर्व सुरक्षा के लिए जाता आर्मी डॉग अपने हैंडलर के साथ

इंडियन आर्मी के पास है एक हजार डॉग्स

मध्य प्रदेश में एक छोटे कस्बे टेकनपुर स्थित नेशनल डॉग ट्रेनिंग सेंटर देश की प्रमुख डॉग ट्रेनिंग एकेडमी है। जहाँ इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। वर्तमान में भारतीय सेना के पास तकरीबन 1,000 प्रशिक्षित कुत्ते हैं। इनकी पावर को बनाए रखने की जिम्मेदारी आरवीसी मेरठ को सौंपी गई है, जहां वे हर दिन वर्कआउट करते हैं। यहां से उन्हें विभिन्न स्थानों पर तैनाती के लिए भेजा जाता है।

बचाव अभियानों का अभिन्न अंग

सैन्य डॉग्स खोज और बचाव अभियानों का अभिन्न अंग हैं, जहां वे विस्फोटक खोजने में मदद करते हैं। उनके बिना ये कार्य काफी मुश्किल होता है। कुत्तों की सूंघने की शक्ति काफी तेज होती है। इसलिए वे आसानी से चीजों की खोज कर लेते हैं। उनकी ट्रेनिंग के दौरान उन्हें सैन्य-विशेष को तुरंत प्रतिक्रिया देना सिखाया जाता है और वे अपने हैंडलर द्वारा दिए गए मौखिक आदेशों और इशारों का जवाब देना सीखते हैं।

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ट्रेनिंग के दौरान इस तरह की चीज़ों का इस्तेमाल संदिग्ध चीजों को पहचानने के लिए किया जाता है

26 साल बाद गणतंत्र दिवस परेड में दिखा आर्मी डॉग्स स्क्वायड 

वर्ष 2016 में गणतंत्र दिवस परेड में आर्मी डॉग्स स्क्वायड ने 26 वर्षों बाद हिस्सा लिया था और इसके लिए मेरठ कैंट स्थित आरवीसी सेंटर और कॉलेज ने मार्च पास्ट के लिए इस टीम को तैयार करने के लिए बहुत मेहनत की थी। इससे पहले 1990 में डॉग स्क्वायड ने गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया था।

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दोस्ती हो तो ऐसी

इसलिए चुने जाते हैं खास नस्ल के डॉग्स

आपने हमेशा ही सेना में जर्मन शेफर्ड और लेबराडोर नस्ल के कुत्ते देखे होंगे। सेना इन कुत्तों को इसलिए चुनती है, क्योंकि जर्मन शेफर्ड और लेबराडोर की सूंघने की शक्ति काफी तेज होती है और इनमें किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम के अनुकूल होने की प्राकृतिक क्षमता होती है। इन्हें प्रशिक्षित करना आसान होता है और इनमें सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने की विशेष योग्यता है।

कुत्तों की प्राकृतिक योग्यताओं के आधार पर होता है डॉग्स का चयन

पांच बजे शुरू हो जाती है दिनचर्या

इन डॉग्स की दिनचर्या सुबह 5 बजे से शुरू होती है, जिसमें ग्रूमिंग, व्यायाम खाना-पीना और एक गहन प्रशिक्षण शामिल होता है, उन्हें संदिग्ध चीजों की पहचान कराने के लिए टॉय-गन, टॉय-रोबोट, बॉल्स व डॉल्स आदि का इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं उनके ट्रेनिंग सेंटर में स्पेशल थिएटर भी होता है, यहां उन्हें चीजों को समझाने के लिए कार्टून फ़िल्में भी दिखाई जाती हैं।

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NTDC में अपने हैंडलर के साथ कार्टून फिल्म देखता आर्मी का एक ड़ाबरमैन

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