DEFENCE

खराब होती जमीन की रक्षा एक बड़ी चुनौती 

जमीन की रक्षा
फोटो साभार- गूगल

नई दिल्ली। जमीनी सीमाओं की रक्षा के लिये भारतीय सैनिक अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं लेकिन देश के भीतर की जमीन की रक्षा नहीं की गई तो भारत की 1.30 अरब आबादी के सामने अस्तित्व की रक्षा का सवाल पैदा हो जाएगा।





इस मसले पर यहां संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से एक वर्कशाप का आयोजन किया गया। जिसकी जानकारी देते हुए संयुक्त राष्ट्र में एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर प्रदीप मोंगा ने ‘रक्षकन्यूज’ के साथ एक विशेष बातचीत में कहा कि पृथ्वी की जिस जमीन पर खेती होती है और जो जमीन उत्पादक कही जाती है वह प्राकृतिक वजहों और विकास की वजह से समाप्त होती जा रही है। प्रदीप मोंगा के मुताबिक पृथ्वी की 2.5 प्रतिशत जमीन  भारत के पास है लेकिन इसकी 18 प्रतिशत आबादी यहां रहती है। भारत में कुल 32 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर  जमीन है जिसमें से 36 प्रतिशत जमीन अब इस्तेमाल के काबिल नहीं रही। ढांचागत निर्माण और खनन उद्योग की वजह से कृषि की जमीन छिनती जा रही है। इसका असर भारत की खाद्य सुरक्षा और गरीब उन्मूलन पर पड़ेगा। पर्यावरण बदलाव को रोकना है तो हमें जमीन पर निवेश करना होगा। पृथ्वी से कार्बन उत्सर्जन को कम करना है तो हमें जमीन पर निवेश करना बेहतर होगा।

जमीन को बेकार होने से बचाने के लिये लगातार जमीन प्रबंध के तरीके अपनाने होंगे। इसके लिये भारत में एक एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है जिसके तहत 2030 तक 130 शहरों में जमीन प्रबंध की बेहतर प्रथा अपनाई जाएगी। इसी तरह चीन भी अपनी जमीन को बेकार होने से बचाने के लिये एक राष्ट्रीय मिशन पर काम कर रहा है।

जमीन का बेहतर प्रबंध किया जाए तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और इससे कार्बन उत्सर्जन को रोका जा सकेगा। उन्होंने बताया कि भारत के दस राज्यों में जमीन का बेकार होते जाना एक बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि भारत में जमीन एक सीमित संसाधन है जिसका सक्षम इस्तेमाल हमें सीखना होगा। इसी से हम अपनी खाद्य सुरक्षा मजबूत कर सकते हैं और अपनी 1. 30 अरब आबादी को भोजन मुहैया करा सकते हैं।

रेगिस्तान के  फैलते  जाने की प्रक्रिया को रोकने के लिये  संयुक्त राष्ट्र के तहत यूएनसीसीडी नाम की अंतरराष्ट्रीय संधि हुई थी जिसमें 120 सदस्य शामिल हुए थे। इसके  तहत नई दिल्ली में एक कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें 41 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और संकल्प लिया कि जमीन के खराब होते जाने की प्रक्रिया रोकने के लिये राष्ट्रीय मिशऩ के तहत काम करेंगे।

प्रदीप मोंगा के मुताबिक हम एक अजीब हालात के शिकार हो सकते हैं। सन् 2050 तक विश्व की आबादी नौ अरब से अधिक होगी जिसकी भोजन और पानी की मांग पूरी करना एक बड़ी चुनौती साबित होगी। इस सदी के मध्य तक आज से 50 प्रतिशत अधिक खाद्य हमें पैदा करना होगा और 70 प्रतिशत अधिक पानी हमें मुहैया कराना होगा। जब हम आने वाले दिनों में जमीन को खोते जाएंगे तब हम अपनी बढ़ी हुई आबादी की मांग कैसे पूरी करेंगे। खासकर भारत के लिये यह एक बड़ी चुनौती पेश होगी। इसके मुकाबले के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों को समन्वित तरीके से काम करना होगा।

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