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प्रोफेसर ने जवानों के लिए बना दी स्वदेशी बुलेटप्रूफ जैकेट

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नई दिल्ली। 70 साल बाद अब भारतीय जवानों के पास स्वदेशी बुलेटप्रूफ जैकेट होंगी, कोयम्बटूर के अमृता विश्वविद्यालय में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख डॉ0 शांतनु भौमिक ने स्वदेशी तकनीक का प्रयोग कर अल्ट्रा लाइटवेट जैकेट को थर्माप्लास्टिक तथा फाइबर का उपयोग कर विकसित किया है।  प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोजेक्ट के तहत ये बुलेटप्रूफ जैकेट पेश किए जाएंगे। प्रधानमंत्री का ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद जैकेट्स का निर्माण जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा।





 डॉ0 शांतनु भौमिक

डॉ0 शांतनु भौमिक -अमृता विश्वविद्यालय में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख

एक जैकेट पर आएगा 50,000 का खर्चा

रिपोर्ट के मुताबिक, जैकेट डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सहयोग से निर्मित की जाएंगी। 70 वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि सेना के पास ऐसी बुलेट प्रूफ जैकेट होंगी, जो पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से निर्मित होंगी। वर्तमान में, भारतीय सेना और पैरा-मिलट्री फोर्सेज सैन्य बलों द्वारा इस्तेमाल की जा रही एक जैकेट पर 1.5 लाख रूपये खर्च करता है। ये जैकेट अमेरिका से आयात की जाती हैं, जबकि डॉ0 भौमिक द्वारा तैयार जैकेट का खर्च केवल 50,000 रूपये प्रति जैकेट होगा। इसका मतलब है कि भारत सेना को दी जाने वाली स्वदेशी जैकेट के इस्तेमाल से प्रति वर्ष 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी।

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वर्तमान में इंडियन आर्मी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली जैकेट काफी भरी होती हैं (फाइल फोटो )

उच्च तापमान में काम करने में सक्षम

वर्तमान में बीएसएफ, सीआरपीएफ और पुलिस जवानों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बुलेट प्रूफ जैकेट काफी भारी हैं। इनका वजन 15 से 18 किलोग्राम के बीच हैं। लेकिन इस नई जैकेट का वजन इससे 6 से 8 गुना कम है। इसका वजन सिर्फ 1.5 किलो है। इसमें कार्बन फाइबर की 20 परतें हैं जो जैकेट को उच्च तापमान में काम करने में सक्षम बनाती हैं। ये जैकेट  57 डिग्री तापमान में भी कम करने में सक्षम होगी।

भारतीय सेना

वर्तमान में भारतीय सेना में इस्तेमाल की जाने वाली बुलेट प्रूफ जैकेट का वजन 15 से 18 किलोग्राम के बीच है

सुभाष चंद्र बोस को समर्पित की जैकेट

प्रोफेसर शांतनु भौमिक को अपने नए आविष्कार से काफी उम्मीद है और परियोजना के लिए इसकी आधिकारिक मंजूरी मिलने पर उन्होंने खुशी व्यक्त की है। उन्होंने पूर्व उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा को धन्यवाद दिया, जिन्होंने भौमिक की इस पहल को प्रोत्साहित किया। प्रोफेसर ने अपना यह प्रयास नेताजी सुभाष चंद्र बोस को समर्पित किया है।

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