Air Force

… एंटी-रेडिएशन मिसाइल का पहला परीक्षण करेगा DRDO

NGARM

भुवनेश्वर। रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (DRDO) न्यू जेनरेशन एंटी रेडिएशन मिसाइल (NGARM) का पहला परीक्षण करने के लिए पूरी तरह तैयार है। ये मिसाइल दुश्मन के रडार, ट्रैकिंग सिस्टम और संचार सुविधाओं को नष्ट करने में सक्षम है। DRDO के अनुसार लड़ाकू विमान मिराज-2000H, जगुआर, SU-30 MKi और भविष्य के लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट्स के लिए विकसित की गई हाई स्पीड एंटी रेडिएशन मिसाइल देश के शस्त्रागार में अपनी तरह की पहली मिसाइल होगी।





  • इसी साल नवंबर में होगा परिक्षण
सुखोई-30MKi

सुखोई-30MKi लड़ाकू विमान

रक्षा सूत्रों के अनुसार मिसाइल के परीक्षण की तैयारी पूरे जोरों पर है। 100 किलोमीटर से अधिक रेंज वाली मिसाइल को परीक्षण के दौरान सुखोई-30MKi लड़ाकू विमान से शीघ्र ही दागा जाएगा। मिसाइल का विकास पूरा हो चुका है और अब इसे लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जा रहा है। यदि सब कुछ योजना के मुताबिक हो जाता है, तो इसी वर्ष नवंबर में इसका पहला परिक्षण किया जाएगा।

  • ऐसे काम करेगी मिसाइल, ये हैं खासियत 

DRDO के मुताबिक न्यू जेनरेशन मिसाइल एक सिंगल स्टेज, लिक्विड आपरेटिंग सिस्टम पर आधारित है। यह एक निश्चित दूरी से ट्रैकिंग नेटवर्क या रडार से उत्सर्जित संकेतों या रेडिएशन को प्राप्त कर दुश्मनों की संचार प्रणालियों को नष्ट कर देने वाली मिसाइल है। NGARM की नोक पर लगा सेंसर रेडियो तरंगों को ग्रहण कर दुश्मन के सिस्टम को नष्ट करेगा। ये मिसाइल भारतीय सशस्त्र बलों को मजबूती देगी। आवश्यकता के अनुसार यह डुअल ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग कर सकती है। विकास संबंधी परीक्षणों के बाद, इसे अग्रणी लड़ाकू विमान ‘सुखोई’ और मल्टी-रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट ‘तेजस’ के साथ भी जोड़ा जाएगा। पहले परीक्षण के दौरान संरचनात्मक शुद्धता, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम तथा वायुगतिकीय क्षमताओं का परीक्षण किया जाएगा। डीआरडीओ द्वारा विकसित, NGARM का वजन लगभग 140 किलो है। यह जगुआर और मिराज जैसे लड़ाकू विमानों पर भी लगाई जा सकती है।

  • भारतीय वायु सेना ने पिछले वर्ष जताई थी आपत्ति

इससे पहले, भारतीय वायुसेना (Indian Air force) ने पिछले वर्ष मिसाइल के वजन पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि 100 से 125 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली NGARM बहुत भारी है और वायुसेना को 100 किलो से कम मिसाइल की आवश्यकता होती है। IAF का कहना है कि रूस की इन्फ्रा रेड रेडिएशन सीकर टेक्नालाजी की वजह से इसका वजन ज्यादा है। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इसे हम सुखोई में इस्तेमाल करेंगे या नहीं?

  • रूस से ली गई टेक्नालाजी

डीआरडीओ ने दावा किया कि नई मिसाइल लड़ाकू विमान की आवश्यकताओं के अनुरूप है, जो उनकी फायर पावर को और ज्यादा बढ़ा देगी। डीआरडीओ वैज्ञानिकों का कहना है कि NGARM मिसाइल वायुसेना की सभी सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करती है। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि यह सफल साबित होगी। डीआरडीओ के एक अन्य स्रोत के अनुसार NGARM काफी हद तक एक स्वदेशी मिसाइल है। एजेंसी खुद पूरी तरह से मिसाइल विकसित नहीं कर सकती इसलिए डीआरडीओ ने सीकर (तरंगों द्वारा खोजी प्रवृति) टेक्नालाजी के लिए रूस से सहायता मांगी है। इसे भारत डायनामिक तथा भारत इलेक्ट्रोनिक्स द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित किया गया है।

  • भारत अमेरिका से भी खरीद सकता है मिसाइलें
रूसी KH-35 मिसाइल

रूसी KH-35 मिसाइल

वर्तमान में वायुसेना लड़ाकू विमान SU-30 MKi पर रूसी KH-35 मिसाइलों का इस्तेमाल करती है तथा ‘जगुआर’ और ‘मिराज’ पर फ्रेंच मार्टेल एंटी-रेडिएशन मिसाइलों का इस्तेमाल करती है। वायु सेना अमेरिका से AGM-88 मिसाइल खरीदने के लिए कीमतों पर बातचीत कर रही है और अगले पांच साल तकरीबन 1500 से ज्यादा मिसाइल IAF में शामिल करने की योजना है। डीआरडीओ NGARM के साथ-साथ मोबाइल लांचर से लांच किए जाने वाले ग्राउंड-बेस्ड रेडिएशन मिसाइल विकसित करने की भी योजना बना रहा है, लेकिन इसके बारे में कोई विवरण अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

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