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करगिल का एक हीरो, जिसने चबवाए थे दुश्मन को नाकों चने, जानें 8 खास बातें

करगिल संघर्ष में प्राप्त विजय में भारतीय सेना ने तो अपने अद्भुत साहस का परिचय दिया था लेकिन इस संघर्ष (युद्धक्षेत्र) में एक अन्य हीरो भी था। हम बात कर रहे हैं ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान अपनी अहम भूमिका निभाने वाली 39 किलोमीटर की दूरी तक गोले दाग सकने वाली बोफोर्स तोप के बारे में। बोफोर्स तोप इस संघर्ष में भारतीय सेना का सबसे महत्वपूर्ण हथियार थी जिसके बल पर ही भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को धूल चटा सकी। यही नहीं बोफोर्स तोप भारतीय सेना का सिरमौर तो बनी ही साथ ही इसके आयात को लेकर हुए घोटाले को लेकर वर्ष 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अपनी सत्ता भी गंवानी पड़ी थी। आखिर क्या है बोफोर्स की कहानी… आइए जानते हैं।





सेकेंड वर्ल्ड वार से हुई थी लोकप्रिय

 

 

बोफोर्स

द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर अभी तक तमाम युद्धों में हिस्सा ले चुकीं बोफोर्स तोपें दुनिया की सबसे सक्षम तोपों में से एक हैं। इस तोप को स्वीडन ने साल 1930-34 में विकसित किया था। जिसके बाद से इन तोपों ने द्वितीय विश्वयुद्ध, भारत-पाक युद्ध, अरब-इजरायल युद्ध, कोरियन युद्ध, इंडोनेशिया-मलेशिया युद्ध, वियतनाम युद्ध, दक्षिण अफ्रीकी सीमा युद्ध, फॉकलैंड युद्ध, लेबनान गृह युद्ध, खाड़ी युद्ध, यूगोस्लाविया युद्ध आदि में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। सेकेंड वर्ल्ड वार के दौरान ये तोपें काफी लोकप्रिय हुईं। ये तोपें जलसेना और थलसेना दोनों के इस्तेमाल के लिए अब तक की सबसे सफल तोप है। इस तोप का इस्तेमाल दुनिया के आधे से ज्यादा देश करते हैं। भारत के लिए इस तोप की खास बात यह है कि इन्हीं तोपों के दम पर भारत ने करगिल युद्ध में पाक पर विजय प्राप्त की थी।

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