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कोमकासा- क्या भारत इसे मान ले ?

पीएम मोदी और ट्रंप
पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप (फाइल फोटो)

कोमकासा अमेरिका द्वारा प्रस्तावित वह रक्षा संधि है जिस पर वह भारत की मंजूरी चाहता है ताकि अमेरिकी शस्त्र मंचों पर सुरक्षित अमेरिकी संचार उपकरणों को तैनात किया जा सके। कोमकासा  का मतलब है– कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलीटी एंड सिक्युरिटी एग्रीमेंट। कोमकासा (COMCASA) को पहले सिसमोआ (CISMOA) के नाम से जाना जाता था। सिसमोआ यानी कम्युनिकेशंस इंटरआपरेबिलीटी एंड सिक्युरिटी मेमोरेंडम एग्रीमेंट ।  कोमकासा उन तीन मौलिक सैनिक समझौतों में है जो अमेरिका अपने मित्र देशों से  स्वीकार करने को कहता है। अन्य दो मौलिक यानी फाउंडेशनल एग्रीमेंट हैं– एलएसए( लाजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम आफ एग्रीमेंट) और बेका यानी BECA( बेसिक एक्सचेंज एंड कोआपरेशन एग्रीमेंट )





एलएसए के बदले इसके नये भारत विशेष प्रारूप लेमोआ (लाजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम आफ एग्रीमेंट ) पर भारत ने 2016 में दस्तखत किये थे। इस समझौते के तहत भारत औऱ अमेरिका एक दूसरे की चुनिंदा सैन्य सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। बीच समुद्र में यदि भारत या अमेरिकी युद्धपोतों को ईंधन या अन्य साज सामान की जरूरत हो तो वे आपस में  आदान प्रदान कर  सकते हैं।

कोमकासा के भारत विशेष समझौता प्रारूप पर  6 जुलाई को  होने वाली  प्रस्तावित टू  प्लस टू वार्ता( भारत अमेरिका के रक्षा व विदेश मंत्रियों की बैठक)  के दौरान भारत की मंजूरी का ऐलान करने की जानकारी रक्षा सूत्रों ने दी थी।

कोमकासा का भारत के सामरिक हलकों में इसलिये विरोध हो रहा था कि इस पर दस्तखत करने के बाद अमेरिका अपनी कम्पनियों द्वारा सप्लाई किए गए हथियारों का समय समय पर निरीक्षण करने का हकदार होगा। यानी वह जब चाहे मांग कर सकता है कि जिन हथियारों पर अमेरिकी संचार उपकरण लगे हैं वह उनकी जांच करेगा। कोमकासा समझौता होने के बाद अमेरिकी शस्त्र मंचों पर अमेरिकी संचार उपकरण लगाए जाएंगे जिसमें अमेरिकी इनक्रिप्शन स्टैंडर्ड के अनुरूप संचार प्रणालियां लगी होंगी। ये संचार उपकरण लगने के बाद  भारतीय औऱ अमेरिकी शस्त्र प्रणालियां आपस में संदेशों का आदान प्रदान करने लायक हो जाएंगे।

कोमकासा समझौता यह अपेक्षा करता है कि जो भी देश इसे मानेगा औऱ अमेरिकी संचार उपकरण अपने मंचों पर लगाएगा उसे अपने हथियार मंचों की जांच करने देनी होगी। इसलिये भारतीय सामरिक हलकों में कोमकासा को भारत की सैन्य प्रणालियों में झांकने वाला समझौता कहा जाता है । कोई भी देश नहीं चाहेगा कि उसके  सैन्य साज सामान की जांच कोई विदेशी सैन्य तकनीशियन  करे। चूंकि भारत की अधिकतर सैन्य प्रणालियां गैर अमेरिकी मूल की हैं इसलिये वे अमेरिकी सैन्य संचार प्रणालियों से तालमेल नहीं बैठा सकेंगी। इसलिये अमेरिकी संचार उपकरण हासिल करने के लिये यदि कोमकासा पर दस्तखत किया जाता है तो भारतीय सैन्य प्रणालियों को अपने ही अमेरिकी मूल के शस्त्र मंचों और संचार उपकरणों से तालमेल बैठाना मुश्किल होगा।

अमेरिकी संचार उपकरणों के संचार कोड व्यावसायिक तौर पर उपलब्ध संचार उपकरणों से अलग होते हैं इसलिये यह भी कहा जाता है कि इन संचार उपकरणों में दुश्मन देश की सेना सेंध नहीं लगा सकती। चूंकि भारत ने अब तक कोमकासा पर दस्तखत नहीं किये हैं इसलिये भारतीय वायुसेना में शामिल अमेरिकी परिवहन विमानों  सी-130 हर्कुलस और सी-17 ग्लोबमास्टर  आदि पर अमेरिकी संचार उपकरण नहीं लगे हैं।

 

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