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समानता के लिए है केंद्रीय सशस्त्रबल की लड़ाई

सीएपीएफ
प्रतीकात्मक

सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष फरवरी में फैसला सुनाया था कि सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र बल) कैडर के अधिकारियों को ‘ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विसेज (ओजीएएस) का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि सीएपीएफ अधिकारी अब नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) नॉन-फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (एनएफएसजी) के लिए योग्य हैं। अदालत के निर्देशों के आधार पर जुलाई में राष्ट्रीय कैबिनेट ने सीएपीएफ के अधिकारियों को ओजीएएस का दर्जा प्रदान किया और एनएफएफयू तथा एनएफएसजी लाभों के विस्तार को भी अनुमोदित किया। तब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले की जानकारी दी। यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावित अधिकारियों तक वित्तीय लाभ पहुंच सके, इसे दो महीने की अंतिम समयसीमा (डेडलाइन) प्रदान की गई।





यह डेडलाइन 30 सितंबर को समाप्त हो रही है और अभी तक अंतिम निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। इस देरी की वजह आईपीएस लॉबी की सुप्रीम कोेर्ट के आदेशों को विफल करने की कोशिशें हैं। वर्तमान में आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर सीएपीएफ का नेतृत्व करता है और उसे यह डर है कि एनएफएफयू की मंजूरी सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र बल) कैडर के अधिकारियों के लिए पदोन्नति और वित्तीय तरक्की के मार्ग खोल देगी और उनके रास्तों को घटा देगी।

उसने ऐसा प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है कि अदालत के निर्देशों के बावजूद  भर्ती के नियमों को पिछले पूर्वव्यापी तरीके से संशोधित नहीं किया जा सकता जिसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान कैडर के केवल पांच प्रतिशत अधिकारी ही लाभ का अनुदान प्राप्त करने के मानक को पूरा कर सकेंगे। वास्तविकता यह है कि अगर एनएफएसजी की मंजूरी दी जाती है  तो सीएपीएफ कैडर के अधिकारियों को आईजी के रैंक तक पदोन्नत किया जाएगा जिससे आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति के अवसर घट जाएंगे।

केंद्रीय गृह मंत्रालय सीएपीएफ और आईपीएस दोनों को नियंत्रित करता है पर किसी स्पष्टीकरण के लिए अदालत के पास वह नहीं गया बल्कि इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण के लिए आईपीएस एसोसिएशन अदालत के पास गया। जाहिर है उसकी मंशा पूरे मामले में देरी करना और शीर्ष अदालत के आदेशों को विफल करना है। सीएपीएफ को अपनी हकदारी वाले लाभों को पाने के लिए भी इसी आईपीएस एसोसिएशन से लड़ाई लड़नी पड़ी थी। बाद में यह लड़ाई अदालतों से निकल कर सोशल मीडिया तक पहुंच गई और इसका ऐसा असर पड़ा कि गृह सचिव को इसमें दखल देना पड़ा और सोशल मीडिया की लड़ाई को समाप्त करने की मांग करनी पड़ी।

सीएपीएफ के भीतर का माहौल इस स्तर तक नीचे गिर गया था कि सीएपीएफ के अधिकारियों ने अपने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों पर अविश्वास करना शुरू कर दिया। हालांकि यह प्रत्यक्ष रूप से जमीनी स्तर (बटालियन एवं कंपनी) पर  कामकाज को प्रभावित नहीं कर सकता है, लेकिन यह योजना निर्माण, खरीद, रिपोर्टिंग और टास्किंग को जरूर प्रभावित करेगा।

वर्तमान गृह सचिव अजय कुमार भल्ला ने हाल ही में विवाद में शामिल सभी पक्षों को सुना और प्रत्येक पक्ष की कुछ मांगों को पूरा करने के जरिये मामले को सुलझाने का वादा किया। पिछले सप्ताह जारी एक बयान में कहा गया कि गृह मंत्रालय एक प्रस्ताव पर विचार कर रहा है जो आंशिक रूप से उनकी मांगों को स्वीकार करते हुए सीएपीएफ अधिकारियों को वित्तीय रूप से राहत प्रदान करेगा। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवमानना  मामले से बचने के लिए एक बीच का रास्ता अपनाने का प्रयास कर रहा है। डीओपीटी ने भी गृह मंत्रालय  का समर्थन किया।

गृह सचिव ने गत 05 सितंबर को सीएपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक में यह बात कही। ऐसा पहली बार हुआ जब प्रभावित कैडर के प्रतिनिधियों की बात सुनी गई। अभी तक  उनके मामले को आईपीएस द्वारा नकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा था।

आईपीएस कैडर सीएपीएफ कैडर के पहले से है इसलिए जैसे ही सीएपीएफ का उत्थान शुरू हुआ  सरकार ने आईपीएस को वरिष्ठ पदों पर शामिल किया। जमीनी स्तर पर तथा उनके बलों को संचालित करने के लगभग सात दशक के अनुभव के साथ सीएपीएफ कैडर अपने खुद के संगठन को चलाने के योग्य हैं। उन्होंने घाटी में सेना के साथ आतंकवाद से निपटने तथा सक्रिय एलओसी के साथ-साथ नक्सल प्रभावित इलाकों और दुर्गम क्षेत्रों में अपनी काबिलियत साबित की है।

दूसरी ओर आईपीएस बिना जमीनी हकीकतों के अनुभव के सत्ता के स्थान पर काबिज हैं। न तो उन्होंने जमीनी स्तर पर सेवा की है और न ही ऐसे क्षेत्रों का अनुभव है जहां सीएपीएफ ने काम किया है। वे प्रतिनियुक्ति केवल इसलिए चाहते हैं जिससे उन्हें पदोन्नति के अवसरों और मिलने वाले भत्तों में बढ़ोतरी हो सके। उनके ऐसे भी उदाहरण देखे गए हैं जब वरिष्ठ अधिकारियों के लिए सामान इकट्ठा करने हेतु अधिकारियों को नामित किया गया और उनके लिए गौरव के क्षेत्र रहे क्वार्टर गार्ड में ट्रैक सूट में सैल्यूट लेने सहित सीएपीएफ की परंपराओं का भी अनादर किया गया।

आईपीएस दावा करते हैं कि उन्हें सरकारी नियमों के तहत नियुक्त किया गया है लेकिन वे देश की जनता को यह भरोसा दिलाने में विफल रहते हैं कि क्यों दशकों पहले बनाये गए नियमों में संशोधन नहीं हो सकता जबकि माहौल बदल चुका है और सीएपीएफ ने इस बीच काफी ज्ञान हासिल कर लिया है। पिछले कई वर्षों के दौरान आईपीएस अधिकारियों ने विविध जांच एजेन्सियों के खुलने और वर्तमान एजेन्सियों के विस्तारित होने के कारण अपनी खुद की पदोन्नति एवं प्रतिनियुक्ति के अवसर बढ़ा लिए हैं। उन्हें अधिक पदों को हड़पने तथा उन्हें बनाये रखने की आवश्यकता क्यों है, खासकर वहीं जहां उनका ज्ञान लगभग शून्य है। संभावित यह उनकी लालच और नियुक्ति के भत्तों को पाने का लोभ है।

सीएपीएफ के भीतर जिस नियम का अवश्य पालन होना चाहिए, यह वही होना चाहिए जो आईपीएस द्वारा राज्य स्तर पर अपनाया जाता है और सेना, जहां उन लोगों ने जिन्होंने जमीनी स्तर से अपनी सेवा आरंभ की है, उन्हें सेना का प्रमुख होना चाहिए। अन्य कैडर से आने वाले लोगों का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए। गृह मंत्रालय को एकपक्षीय निर्णय लेना चाहिए और निर्देश देना चाहिए कि प्रतिनियुक्तियों को समाप्त कर दिया जाए और केवल सेवा में रहे अधिकारियों को पदोन्नत किया जाए। यह बल की कार्य क्षमता को बढ़ाएगा।

 

 

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