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बीटिंग रिट्रीट और वतन के लिए मर-मिटने का जज्बा पैदा करता मिलिट्री बैंड, जानें 9 खास बातें

यूं तो कई ऐसे मौके आते हैं, जब भारतीय सेनाओं के बैंड अलग-अलग प्रस्तुति देते हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली में रायसीना हिल्स पर होने वाली बीटिंग रिट्रीट एक ऐसा मौका होता है जब सेना के तीनों अंगों के बैंड एक साथ अपना हुनर दिखाते हैं।





युद्ध और संगीत यूं तो एक दूसरे के विपरीत बातें हैं लेकिन जो संगीत एक तरफ रूह को सुकून देता है। वहीँ, जंग के मैदान में दुश्मन के खिलाफ जवानों में कुछ कर गुजरने के भाव भी भर देता है। युद्ध के मैदान में बजने वाला संगीत जवानों में अपने वतन के लिए प्रेम और मर-मिटने का जज्बा पैदा करता है। आखिर क्या है भारतीय मिलिट्री बैंड की खूबियां और कितनी खास हैं सेना के संगीत की धुनें, आइये जानते हैं-

बीटिंग रिट्रीट पर तीनों सेना एक साथ दिखाती हैं संगीत का हुनर

बिटिंग द रिट्रीट पर तीनों सेना

‘बीटिंग रिट्रीट’ के साथ एक और खासियत भी जुड़ी है, जब तीनों सेनाओं के प्रमुख और भारत के राष्ट्रपति ‘विजय चौक’ के लिए निकलते हैं, तब 200 साल पुरानी परंपरा वाला एक बिगुल बजाया जाता है जिसे पहली बार जर्मन और ब्रिटिश सेना ने प्रयोग किया था।

1950 में बना ‘मिलिट्री स्कूल ऑफ म्यूजिक’

आर्मी बैंड

आज हम जिस भारतीय मिलिट्री बैंड से परिचित हैं, उसकी कहानी 300 साल के ब्रिटिश मिलिट्री बैंड के इतिहास से जुड़ी है। ब्रिटिश राज खत्म हुआ तो मिलिट्री बैंड का भारतीयकरण शुरू हुआ। कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने इस चुनौती को स्वीकार किया और 1950 में मध्य प्रदेश के पचमढ़ी में ‘मिलिट्री स्कूल ऑफ म्यूजिक’ की नींव रखी। इसे ‘नेलर हॉल ऑफ इंडिया’ भी कहा जाता है। यही वह समय था जब भारतीय धुनों पर आधारित हिंदुस्तानी मिलिट्री बैंड को आकार दिया गया।

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