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जानिए, कितनी खूबियां हैं जवानों को मिलने वाले नए बुलेटप्रूफ हेलमेट में

इस हेलमेट को MKU बनाने वाली है, जो बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट बनाने में विश्व में अग्रणी कंपनी है।

सेना के जवानों को पहली बार विश्वस्तरीय बुलेटप्रूफ हेलमेट प्रदान किए जाएंगे। भारतीय सेना को अक्सर आतंकियों व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जूझना पड़ता हैं, जहां सेना तो लोगों की सुरक्षा तो कर लेती है, लेकिन खुद को घातक हमलों से बचाना उनके लिए चुनौती होता है। मुख्य रूप से जवानों के पास अभी तक बुलेटप्रूफ हेलमेट न होने की वजह से उन्हें अपने सिर को बचाना मुश्किल होता था, लेकिन अब सेना के जवानो को अपनी रक्षा करने के लिए वर्ल्ड क्लास हेलमेट मिलेंगे। इस हेलमेट को MKU बनाने वाली है, जो बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट बनाने में विश्व में अग्रणी कंपनी है।ये हेलमेट 9 MM की गोली को झेलने में सक्षम हैं आइये जानते हैं कितने महत्वपूर्ण हैं ये खास हेलमेट।





ये हैं फायदे

  • नए बुलेटप्रूफ हेलमेट्स से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि गर्दन से ऊपरी हिस्से पर यदि गोली लगती है तो जवानों की जान नहीं जाएगी। गर्दन या उससे ऊपर गोली लगने की स्थिति में जवानों के शहीद होने का खतरा ज्यादा रहता है।
  • बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट पहने जवानों को दुश्मन आसानी से टारगेट नहीं कर सकते।
  • अगर जवानों को शरीर के दूसरे हिस्सों में गोली लगती भी है तो जान जाने का खतरा ज्यादा नहीं रहता।
  • नए बुलेटप्रूफ हेलमेट अगले तीन वर्षों के भीतर एमकेयू इंडस्ट्रीज से मिलना शुरू हो जाएंगे जो कि विश्वस्तरीय बॉडी आर्मर (बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट) निर्माता कंपनी है। यह कंपनी पूरी दुनिया की सेनाओं को बॉडी आर्मर भी निर्यात करती है।

नए बुलेटप्रूफ हेलमेट की खासियत

  • नए हेलमेट इस तरह से डिजाइन किए गए हैं कि वे बहुत कम दूरी से फायर किए 9 एमएम विस्फोटक के प्रभाव को सहने में सक्षम होंगे।
  • ये हेलमेट विश्व के प्रमुख बलों के तय मानकों को पूरा करते हैं।
  • ये हेलमेट सुविधाजनक भी हैं और उनके भीतर संचार उपकरण को भी लगाया जा सकता है।
  • अभी इस्तेमाल किए जा रहे बुलेटप्रूफ हेल्मेट से वजन में कम होगा। वजन 1.5 किलो होगा। अभी इस्तेमाल हो रहे हेलमेट का वजन 2.5 किलोग्राम है।


दो दशक बाद हुआ बदलाव

दो दशक से भी अधिक समय पहले, भारतीय सेना की एलीट अर्ध विशेष बलों को इजरायली ओआर-201 हेलमेट से लैस किया गया था। हालांकि नियमित सैनिकों को भारी वजन वाले घरेलू बाजार से बने हेलमेट दिए गए थे जो कि युद्ध जैसी स्थितियों के लिए सुविधाजनक नहीं थे।

जवानों को होती थी दिक्कतें

एक्सपर्ट बताते हैं कि जवाबी कार्रवाई में ऑपरेशन के दौरान सेना के जवानों को बुलेट प्रूफ़ ‘पटका’ पहनना होता है। इनकी सीमाएं सीमित हैं. ये सिर्फ सिर के अगले और पिछले हिस्से को ही सुरक्षा प्रदान करते हैं। पटका में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसका वजन 2.5 किलोग्राम होता है और इसे सिर पर रखकर जवाबी कार्रवाई करने में जवानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

 

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