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आर्मी चीफ को कहा ‘सड़क का गुंडा’, दोबारा मांगनी पड़ी माफी

संदीप दीक्षित

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की तुलना ‘सड़क के गुंडे’ से करने के लिए सोमवार को एक बार फिर माफी मांगी है। राजनीतिक गलियारों में तो इसे लेकर गहमागहमी है ही सेना के राजनीतिकरण पर मेजर (रिटायर्ड) सुरेन्द्र पूनिया ने भी काफी तीखी टिप्पणी की हैं। इस बीच पूर्व सैनिकों ने अपने परिवार के साथ राजघाट पर संदीप दीक्षित के बयान के खिलाफ प्रदर्शन किया।





  • कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सेना प्रमुख बिपिन रावत पर पूर्व सांसद संदीप दीक्षित के बयान को गलत करार देते हुए संदीप को सेना प्रमुख पर बयानबाजी न करने की सलाह दी है। राहुल कहा कि सेना प्रमुख देश का होता है और संदीप दीक्षित का ‘हमला’ गलत है। उन्होंने कहा कि सेना और सेना प्रमुख पर नेताओं को, राजनीतिक दलों को टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। सेना देश की रक्षा करती है।

संदीप ने रविवार को पाकिस्तान के आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा के सीमा संबंधी बयान पर सवाल पूछे जाने पर कहा था, “हमारी सेना पाकिस्तान जैसी माफिया सेना नहीं है जो ‘सड़क के गुंडे’ जैसे बयान देती है। यह देखकर बहुत खराब लगता है जब हमारे आर्मी चीफ ‘सड़क के गुंडे’ जैसा बयान देते हैं।” संदीप ने कहा कि सेना प्रमुख को राजनीतिक बयान नहीं देने चाहिए।

हालांकि उन्होंने बवाल बढ़ने पर यह कहते हुए माफी मांग ली कि “मुझे सेना प्रमुख के कमेन्ट पर आपत्ति है लेकिन मुझे शायद शब्दों का बेहतर चयन करना चाहिए था। मैं माफी माँगता हूँ।” केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने इस पर ट्वीट किया कि कांग्रेस की समस्या क्या है? कांग्रेस ने आर्मी चीफ को गुंडा कहने की हिम्मत कैसे की। उधर कांग्रेस ने संदीप के बयान से पल्ला झाड़ लिया है।

  • संदीप दीक्षित पूर्वी दिल्ली से लोकसभा सदस्य रहे हैं। वह दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सुपुत्र हैं। इनके पिटा आईएएस अफसर थे। उनकी मौत ट्रेन में सफ़र के दौरान हार्ट अटैक से हो गई थी। संदीप के दादा उमाशंकर दीक्षित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में कई और पदों के अलावा देश की आंतरिक सुरक्षा (गृह मंत्री) के मुखिया रहे हैं।

टिप्पणी

ये कैसी राजनीति है जो देश की सरहद या आंतरिक सुरक्षा को ठेंगे पर रखकर ऊल-जलूल टिप्पणियाँ करती है? राजनीति से न देश की सरहद संभली और न आंतरिक हालात। फिर भी बेवजह हतोत्साहित करने वाली बयानबाजी। किसी भी कीमत पर बात सेना का मनोबल बढाने वाली ही होनी चाहिए लेकिन जब कोई राजनेता सेना प्रमुख को ‘सड़क का गुंडा’ कहता है तो आम नागरिक उससे खुश या प्रभावित नहीं होता वरन धिक्कारता ही है। राजनेताओं को तो महज बयान ही देना होता है जबकि सरहद पर जो जवान/अफसर लड़ते हैं या शहीद होते हैं वो किसके लिए? क्या राजनेता इस देश का नागरिक नहीं है? क्या उसे देश असुरक्षित रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता?

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