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दिलेर आर्मी चीफ जनरल वैद्य से जुड़ी 5 ख़ास बातें

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नई दिल्ली। अपनी दिलेरी और सूझबूझ के लिए लोकप्रिय रहे जनरल जनरल एएस वैद्य (पूरा नाम अरुण कुमार श्रीधर वैद्य) ने कर्तव्य परायणता के चरम को छुआ था। देश और सेना ने उन्हें इसके लिए सम्मान और मेडल से नवाजा। उनके काम करने के तरीकों को सैनिक अफसर आज भी याद करते हैं। उनके जीवन और शख्सियत से जुड़ी ये 5 बातें खास हैं…





जनरल एएस वैद्य

यह पिक्चर उस वक्त की है जब एएस वैद्य (आगे दाएं) सेकंड लेफ्टिनेंट थे और हैदराबाद में पोलो आपरेशन में हिस्सा लिया था

27 जनवरी 1926 को अलीबाग में जन्मे अरुण कुमार श्रीधर वैद्य ने 1945 में आर्म्ड कार्प्स में कमीशन प्राप्त किया और दूसरे विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया।

जनरल एएस वैद्य

जनरल एएस वैद्य फील्ड मार्शल करिअप्पा के साथ

चार दशक तक भारतीय सेना की सेवा करने वाले जनरल वैद्य को भारत पाकिस्तान युद्ध (1965) में बहादुरी का प्रदर्शन करने पर महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। तब वो कमांडेंट थे। 1983 में उन्हें परम विशिष्ट मेडल (PVSM) मिला और उसी साल सेना प्रमुख बनाया गया। इस ओहदे से वह 1985 में रिटायर हुए। मृत्यु उपरांत उन्हें पदम विभूषण से भी सम्मानित किया गया।

जनरल एएस वैद्य

जनरल एएस वैद्य सेना मुख्यालय में

अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उसके साथियों से मुक्त कराने के लिए किए गए विवादास्पद ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की कमान उन्होंने ही संभाली थी। इसकी पूरी व्यूह रचना उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर की थी। इस ऑपरेशन को जनरल वैद्य ने अपने जीवन का ‘सबसे मुश्किल और दर्दनाक’ फैसला करार दिया था।

जनरल एएस वैद्य

आपरेशन ब्लू स्टार के बाद अमृतसर में जनरल एएस वैद्य

ऑपरेशन ब्लू स्टार की वजह से वो खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों की हिट लिस्ट में थे और उन्हें लगातार धमकियां मिलती रहती थीं।

 

जनरल एएस वैद्य

यह वह स्थान है जहां जनरल एएस वैद्य की हत्या हुई थी…और अब वहाँ उनका स्मारक है…इसका अनावरण उनके बड़े भाई वसंत वैद्य (दाएं) ने किया था

ऑपरेशन ब्लू स्टार के तकरीबन दो साल बाद 10 अगस्त 1986 को आतंकवादियों हरजिन्दर सिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुक्खा ने पुणे में उनकी हत्या कर डाली। उस वक्त वो पत्नी के साथ कार में जा रहे थे और उनका सुरक्षाकर्मी पिछली सीट पर बैठा था। दोनों आतंकवादियों ने उन्हें बेहद करीब से सरेआम गोलियां मारीं और फरार हो गए। जिंदा-सुक्खा को 1992 में फांसी दी गई।

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