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सारागढ़ी युद्ध स्मारक धार्मिक संस्था को सौंपने के फैसले से गुस्साए पूर्व सैनिक

यहीं हुआ था सारागढ़ी का ऐतिहासिक युद्ध

पटियाला। सारागढ़ी के ऐतिहासिक युद्ध में शहीद हुए 21 सिख सैनिकों की याद में फिरोजपुर में बने स्मारक को धार्मिक संस्था के सुपुर्द किए जाने के फैसले से पूर्व सैनिकों में गुस्सा है। पंजाब सरकार ने 3 दिसंबर को यह फैसला लिया था और इसे वापस लेने के लिए पूर्व सैनिकों ने पंजाब के राज्यपाल वीपी बदनौर से गुहार की है।





सरकार ने ये स्मारक नानकसर सम्प्रदाय बाबा नन्द सिंह ट्रस्ट को सौंपने का फैसला कैबिनेट की बैठक में लिया था। लेकिन 6 जनवरी राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने की वजह से फैसले पर अमल नहीं हो पाया था।

सारागढ़ी स्मारक और लोकाचार प्रचार फोरम के सचिव रिटायर्ड कैप्टन अमरजीत सिंह जैजी ने निर्वाचन आयोग को तब पत्र लिखा था। अब इसी संस्था ने राज्यपाल को लिखा है कि इस महान स्मारक की पवित्रता बनाए रखने और इसे सराय में तब्दील करने से रोका जाए।

राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा गया है कि राज्य में विभिन्न धर्मों को मानने वाले गुरुद्वारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं लेकिन सारागढ़ी सिर्फ धार्मिक स्थल भर नहीं है। ये एक युद्ध स्मारक भी है। इसे धार्मिक ट्रस्ट को सौंपे जाने का फैसला शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की सरकार ने राजनीतिक हित साधने के लिए किया। कैप्टन अमरजीत का कहना है कि ऐसा करना देश की सेना की ड्यूटी करते हुए शहीद हुए बहादुर सैनिकों का अपमान है, जो हमें कबूल नहीं।

2006 में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के फैसले के बाद स्मारक, सारागढ़ी मेमोरियल ट्रस्ट को सौंपा गया था। स्थानीय जनरल आफिसर कमांडिंग (GOC) इसके अध्यक्ष और जिले के उपायुक्त इसके उपाध्यक्ष हैं। लेकिन 1 अगस्त 2008 को अकाली सरकार ने यह व्यवस्था ख़त्म कर दी। इस स्मारक को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित निशानी के तौर पर मान्यता दी है।

सारागढ़ी के शहीद

सारागढ़ी युद्ध को UNESCO ने दुनिया के 10 महान युद्धों में शुमार किया है। 12 सितम्बर 1897 को हुए इस युद्ध में ब्रिटिश शासनकाल की 36वीं सिख बटालियन (वर्तमान में सिख रेजीमेंट की चौथी बटालियन) के 21 सिख सैनिकों ने शहादत दी थी।

सारागढ़ी का युद्ध

  • यह लड़ाई अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाके नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (अब यह इलाका खैबर पख्तूनख्वा (पाकिस्तान) कहा जाता है) में लड़ी गई थी
  • सैन्य चौकी को 10000 अफगानों ने घेर लिया था, इस चौकी पर 21 सिख जवानों की टुकड़ी तैनात थी
  • ये अफगानी औरक्जई और आफरीदी समुदाय के थे
  • इस टुकड़ी का नेतृत्व हवलदार ईशर सिंह कर रहे थे, उन्होंने भागने के बजाय लड़ते हुए मर जाना बेहतर समझा
  • कुछ सैन्य इतिहासकारों ने इसे इतिहास की महान लड़ाइयों में से एक माना
  • हालांकि दो दिन बाद ही ब्रिटिश इन्डियन की एक अन्य सेना ने  पुन: कब्जा कर लिया
  • सिख सैन्य कर्मी युद्ध को हर साल 12 सितम्बर को ‘सारागढ़ी डे’ के रूप में याद करते हैं

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