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जब तक आखिरी गोली और आखिरी फ़ौजी है… एक इंच पीछे नहीं हटूंगा

मेजर सोमनाथ शर्मा

मेजर सोमनाथ शर्मा! एक ऐसा नाम जो रणभूमि में शूरवीरता का ऐसा इतिहास लिख गया कि उनके कारनामे ही नई पीढ़ी के लिए जोश और कुरबानी का जज्बा जगाने को काफी हैं। मेजर सोमनाथ शर्मा के आखिरी लफ्ज थे-दुश्मन हमारे से सिर्फ 50 गज के फासले पर है। हमारी तादाद न के बराबर है। हम जबरदस्त गोलाबारी से घिरे हैं। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा जब तक हमारे पास आखिरी गोली और आखिरी फौजी है।





जैसा कहा वैसा कर दिखाया इस रणबांकुरे ने। भारतीय सेना के शुरुआती पन्नों में अपना नाम दर्ज कर गया ये फौजी-यही है पहला परमवीर चक्र विजेता। 2003 में भारत सरकार ने शहीद मेजर सोमनाथ पर पांच रूपये का डाक टिकट भी जारी किया था।

विरासत में मिला था फौजी जज्बा 

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में 31 जनवरी 1923 को जन्मे सोमनाथ को फौजी जज्बा तो विरासत में ही मिला था। पिता मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा और अंकल कैप्टन डी वासुदेव की छाया में पले बढ़े सोमनाथ शर्मा ने फौज में जाने का सपना तो बचपन में ही पाल लिया था। नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से पढ़ाई के बाद देहरादून के प्रिंस ऑफ वेल्स मिलिट्री कॉलेज में दाखिला और फिर रॉयल मिलिट्री कालेज की पढ़ाई। 1942 की 22 फरवरी को सोमनाथ ने 19 हैदराबाद रेजिमेंट की 8वीं बटालियन में कमीशन प्राप्त किया। तब ब्रिटिश इंडियन आर्मी थी बाद में यही कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन बनी।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वह कर्नल के. एम. थिमैय्या के साथ थे (जो 1957-1961 के बीच चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रहे) कर्नल थिमैय्या ऐसे पहले भारतीय अधिकारी थे जिसने इनफेंटरी ब्रिगेड कमांड की।

मेजर सोमनाथ चौथी कुमाऊं की डेल्टा कम्पनी को संभाल रहे थे…

मेजर सोमनाथ शर्मा

मेजर सोमनाथ शर्मा हाथ में प्लास्टर बांधे हुए (बीच में)

भारत की आजादी का ऐलान हो चुका था और साथ ही कश्मीर संघर्ष भी शुरू हुआ। अक्टूबर का महीना था। पाकिस्तान की तरफ से कबीलाई दुश्मनों ने कश्मीर की तरफ रुख कर लिया था। मेजर सोमनाथ चौथी कुमाऊं की डेल्टा कम्पनी को संभाल रहे थे। ये कम्पनी भी 31 अक्टूबर 1947 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे से श्रीनगर पहुंचा दी गई। लेकिन दिक्कत एक ही थी। मेजर सोमनाथ के दाहिने हाथ पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था। हाकी के शौकीन मेजर खेलते वक्त हाथ तुड़वा बैठे थे लेकिन ये मामूली सी चोट भला क्या रुकावट बनती।

…और मेजर सोमनाथ की कम्पनी को बडगाम जाने का आदेश मिला

डाक्टरों की सलाह के उलट मेजर सोमनाथ ने मोर्चे पर जाने का मन बना लिया था। दो दिन बाद ही खबर आई कि दुश्मन श्रीनगर से कुछ ही फासले पर बडगाम तक आ पहुंचा है। बस 161 इनफेंटरी ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर एल. पी. बोगेसेन ने मेजर सोमनाथ की कम्पनी को बडगाम जाने का आदेश दिया।

बडगाम पहुंचते ही नजारा वही दिखा जिसकी उम्मीद की जा रही थी। एक तरफ दुश्मन के आगे बढ़ने की हरकत साफ दिखाई दे रही थी लेकिन मेजर शर्मा को अहसास होने में देर न लगी कि दुश्मन की ये हरकत ध्यान बंटाकर हमला और घुसपैठ करके हवाई अड्डे तक पहुंचने के मकसद से है। मेजर शर्मा की कम्पनी की टुकड़ी मोर्चाबंदी कर चुकी थी।

मेजर सोमनाथ

मेजर सोमनाथ (फाइल फोटो)

500 का मुकाबला 50 जवानों के बूते

दोपहर का वक्त था। और अचानक करीब पांच सौ से ज्यादा कबीलाई लश्करों ने मेजर शर्मा की कम्पनी पर मोर्टार से हमला कर डाला। मेजर शर्मा की कंपनी भी जवाबी हमला कर रही थी लेकिन सिर्फ 50 जवानों के बूते पर।

हमले में कंपनी के जवान लगातार हताहत हो रहे थे। हालात भांपते ही मेजर सोमनाथ ने कमांड को और मदद के लिए संदेश भेजा। लेकिन वह बखूबी जानते थे कि यहां मोर्चाबंदी रखते हुए दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकना कितनी अहमियत रखता है। वहां से श्रीनगर हवाई अड्डा ज्यादा दूर नहीं था और यही हवाई अड्डा एक ऐसा जरिया था जिसने भारत के बाकी हिस्से को जोड़कर रखा हुआ था। दुश्मन अगर हवाई अड्डे पर कब्जा कर लेता तो भारतीय फौज का कश्मीर पहुंचने का हवाई रास्ता बंद हो जाता।

हाथ में फ्रेक्चर के बावजूद लाइट मशीनगन की मैगजीन में गोलियां भरकर जवानों को दे रहे थे

खतरनाक हालात को भांपते हुए मेजर शर्मा एक मोर्चे से दूसरे तो दूसरे से तीसरे पर खुद ही पोजीशन लेते रहे। बचे हुए साथियों की मदद, हौसला अफजाई के साथ-साथ दुश्मन के अन्दर भ्रम पैदा करने के लिए भी ऐसा करना जरूरी था। सबसे आगे मोर्चा संभाले हुए दो पलटन खत्म हो चुकी थीं। लेकिन बहादुरी सूझ-बूझ और अदम्य साहस से, भारी गोलाबारी के बीच मेजर शर्मा एक से दूसरी जगह पर पोजीशन लिए साथियों के पास पहुंचते रहे और लगातार निर्देश देते रहे। इतना ही नहीं गोलीबारी के जवाब में जरा भी सुस्ती न आए और हमला लगातार चलता रहे, ये भी उन्होंने सुनिश्चित किया। यहां तक कि हाथ में फ्रेक्चर होने के बावजूद वह लाइट मशीनगन की मैगजीन में गोलियां भरकर जवानों को दे रहे थे।

मेजर सोमनाथ

मेजर सोमनाथ पर भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था (फाइल फोटो)

इसी बीच मोर्टार का एक गोला ऐसा आया कि मेजर उसकी चपेट में आ गए और शहीद हो गए। एक सच्चे योद्धा की तरह मोर्चे की अग्रिम पंक्ति में देश के लिए कुरबानी। उनकी कुरबानी बेकार नहीं गई और इसी कुरबानी ने उनके बचे हुए साथियों में और जोश भर दिया। वो अब दुश्मन पर हद से ज्यादा ताकत से टूट पड़े। …और तब तक रणक्षेत्र में लड़ते रहे जब तक और मदद नहीं आ पहुंची। जी हां! छह घंटों में डेल्टा कम्पनी की नफरी 50 से घटकर 30 रह गई थी। मेजर शर्मा, एक जेसीओ के अलावा 20 फौजी शहादत पा चुके थे।

चौथी कुमाऊं की इस कम्पनी को जितना जानी नुकसान हुआ उससे दस गुना से ज्यादा नुकसान दुश्मन को पहुंचाया इन्होंने। कहा तो यह भी जाता है कि दुश्मन की तादाद 1000 थी और डेल्टा कंपनी ने 350 को धराशायी किया था। और सबसे खास बात-एक इंच भी पीछे नहीं हिली थी ये कम्पनी।

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