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हैरान कर देने वाले सियाचिन के ये सात खौफनाक सच !

नई दिल्ली: समुद्र तल से साढ़े अठारह हजार फुट से भी ज्यादा ऊंचाई पर सियाचिन में रहने वाले जवानों की जिंदगी सच में बेहद खौफनाक है। यहां सुरक्षाबलों के जवान 24 घंटे मौत के साये में गुजारते हैं। और उनका दुश्मन कोई शक्तिशाली हथियारबंद नहीं बल्कि यहां का मौसम है। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र की पूर्वी काराकोरम रेंज में बरसों से अपने देश के कब्जे का बरकरार रखना इन भारतीय सैनिकों का काम है। यहां जिंदगी सूर्य की कृपा पर नहीं मिट्टी के तेल से चलती है।





इग्लू फाइबर और बर्फ से बना होता है इसी में जवान रहते हैं (फाइल फोटो)

  • यहां एक छोटे से इग्लू (बर्फ में बनाया गया बंकरनुमा कमरा) में कभी-कभी तो पांच-छह जवानों को भी रहना पड़ता है। फाइबर और बर्फ से ही बने इन इग्लू के भीतर गर्माइश के लिए सिर्फ मिट्टी के तेल के लैम्प और स्टोव का ही सहारा होता है। यहां गर्म पानी की बोतल भी कुछ ही देर तक गर्म रह पाती है। इग्लू के भीतर तेल का धुंआ इस कदर होता है कि सब कुछ उसके रंग जैसा हो जाता है। यहां तक कि इंसान का थूक भी।

कुछ इस तरह से हथियारों को पकड़ते हैं फौजी (फाइल फोटो)

  • अक्सर तापमान 50 डिग्री से भी नीचे चला जाता है। ऐसे में धातु के किसी सामान को तो नंगे हाथ छूने का मतलब होता है मानो करंट भरे बिजली के नंगे तार को छू लिया हो क्योंकि वो ठंडी ही इतनी हो जाती है। हथियार को छूने से भी पहले खास किस्म के दस्ताने पहनने पड़ते हैं। अगर हाथ में पसीना आया तो पसीना तक जमकर बर्फ में तब्दील हो जाता है। ऐसे में अंगुलियां जम जाती हैं और कभी-कभी तो इतना इन्फेक्शन को जाता है कि अंगुलियां काटनी तक पड़ जाती हैं।

सियाचीन में जवानों के लिए ऐसे होते हैं मेडिकल कैम्प (फाइल फोटो)

  • स्वास्थ्य जांच या किसी इलाज के लिए जब जवानों को बेस कैम्प लाया जाता है तो पता चलता है कि लम्बे समय तक ग्लेशियर में रहने से किसी को बहरापन हो गया तो किसी की आंखों की रोशनी कम हो गई और कुछ मामलों में तो याददाश्त तक पर असर पड़ता है। ये इसलिए क्योंकि उन्हें लगातार आक्सीजन मास्क लगाकर रखना पड़ता है।सर्दियों में बोलने में दिक्कत, जी मिचलाना, नींद की कमी और अवसाद तो यहां तैनात फौजियों के लिए आम समस्या है।

सियाचीन में तैनात जवानों के लिए खाना सप्लाई करता आर्मी का हेलिकॉप्टर (फाइल फोटो)

  • ताजा खाना मिलना तो यहां सपने देखना जैसा है। सेब, आलू या टमाटर तो ऐसे लगते हैं मानो लोहे के गोले हों।हेलिकाप्टर की मदद से डिब्बा बंद खाना इन्हें पहुंचाया जाता है और कभी-कभी तो ये डिब्बे फौजियों तक पहुंचने की बजाय सीधे बर्फ के पेट की खुराक बन जाते हैं।
  • शरीर के ही जम जाने का खौफ इस कदर रहता है कि सैनिक महीने में एक ही बार नहाता है और वो भी खासतौर से बनाए गए स्नानघर के जरिए। एक फौजी यहां तीन महीने रहता है और दर्जनभर गर्म जुराब दिए जाते हैं। किसी तरह की धुलाई का तो सवाल ही कम पैदा होता है क्योंकि पीने के पानी का इंतजाम केरोसिन के स्टोव पर बर्फ पिघलाकर ही किया जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में रोजाना गश्त करते हैं जवान (फाइल फोटो)

  • रायफलों को गर्म रखने के लिए भी केरोसिन स्टोव का सहारा लेना पड़ता है और कहीं मशीन गन जाम न हो जाए, इसके लिए उन्हें वक्त वक्त पर उबलते पानी में डुबोना भी पड़ता है।
  • बड़े से बड़ा पर्वतारोही जहां खराब मौसम में ऐसी जगह पहुंचने की हिम्मत नहीं कर सकता लेकिन भारतीय फौजी यहां लगातार गश्त तक करते हैं। कभी-कभी तो बर्फीले तूफान लगातार कई दिन तक चलते हैं।

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