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वीडियो : असम रेजिमेंट का गौरवशाली इतिहास …बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है…

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दर्द और तकलीफ देने वाले रणक्षेत्र में कभी-कभार दिलचस्प और रोमांच किस्से कहानियां भी जन्म लेते हैं। असम रेजिमेंट के जवान बदलूराम की मौत के बाद भी कुछ ऐसा हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जान गंवा बैठे बदलूराम को आज 22 बटालियन वाली ये रेजिमेंट बड़ी शिद्दत से न सिर्फ याद करती है बल्कि बदलूराम के उस अहसान को हर खास समारोह में गा गाकर सबको बताती है….बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है…।





बदलूराम पर बनाया गया ये गीत बहुत रोमांचक है…देखने के लिए क्लिक करें

  • बदलूराम के गाने के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों से ताल्लुक रखने वाली इस रेजिमेंट की कई अनूठी खासियत हैं।
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दूसरे विश्व युद्ध में मोर्चे पर असम रेजिमेंट के जवान (फाइल फोटो)

1939 से 1945 के बीच 30 देश जिस युद्ध के किरदार बने उसी सेकंड वर्ल्ड वार में असम रेजिमेंट का गठन हुआ। तारीख थी 15 जून और गठन करने वाले अफसर थे लेफ्टिनेंट कर्नल रॉस हॉमैन। ये रेजिमेंट भारत में घुस रही जापानी फौजों का मुकाबला कर रही थीं। लेकिन इससे पहले ही बदलूराम नाम के जवान की मौत हो गई।

  • लेकिन बदलूराम के मामले में ऐसा नहीं हो सका। बदलूराम को मौत के बाद दफना तो दिया गया लेकिन क्वार्टर मास्टर उसका नाम ना मिटा सका।

तब युद्ध लड़ रहे हर सैनिक के नाम से उसका राशन (खाना-पीना) सप्लाई होता था। जो सैनिक मारा जाता था उसका नाम क्वार्टर मास्टर राशन सप्लाई के लिए भेजी जाने वाली लिस्ट में से काट देता था। लेकिन बदलूराम के मामले में ऐसा नहीं हो सका। बदलूराम को मौत के बाद दफना तो दिया गया लेकिन क्वार्टर मास्टर उसका नाम ना मिटा सका। लिहाजा बदलूराम के हिस्से का राशन भी उसकी कम्पनी में पहुंचता रहा।

ये सिलसिला कई महीने चला और बदलूराम के हिस्से का राशन जमा होता रहा। इसी बीच जापानी फौजियों ने असम रेजिमेंट को घेर लिया। हालत ये हुई कि रेजिमेंट के जवानों को रसद सप्लाई तक नहीं हो पाई। ऐसे में जवानों ने उसी राशन को खाकर दिन बिताए जो बदलूराम के नाम से लगातार आता रहा था।

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गेंडे जैसी ताकात वाला असम रेजिमेंट !

तब सबको अहसास हुआ कि अगर बदलूराम का राशन ना आता तो कई सैनिक अपनी जान तक नहीं बचा सकते थे। बस इसी घटना पर एक अधिकारी ने गीत लिख दिया..

  • …बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है …और हमको उसका राशन मिलता है।

बदलूराम के गाने के अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों से ताल्लुक रखने वाली इस रेजिमेंट की कई अनूठी खासियत हैं। अभिवादन ‘तगड़ा रहो’ भी इन्हीं खासियत में से एक है जो मेजर जनरल एससी बारबोरा की देन है। जनरल बारबोरा अकसर जवानों और युवा अधिकारियों का हालचाल पूछते वक्त कहते थे- तगड़ा रहो (मजबूत रहो), जवाब मिलता था तगड़ा है साहेब (मैं तगड़ा हूं सर)।

गेंडे के चिन्ह पर फख्र करने वाली असम रेजिमेंट में ‘तगड़ा’ शब्द समय के साथ इतना लोकप्रिय हो गया कि ये इसके फौजी की पहचान बन गया । वहीं, बदलूराम का बदन… गीत पासिंग आउट समारोह का अहम हिस्सा बन गया।

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