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#Kargildiary : वो 15 मई… जब दो जांबाजों ने रची अपनी शौर्य गाथा !

करगिल संघर्ष

#Kargildiary





कश्मीर के बटालिक सेक्टर के करगिल में पाकिस्तानी सेना समर्थित घुसपैठियों का सफाया करने का आक्रामक ऑपरेशन बेशक 26 मई 1999 को शुरू किया गया लेकिन पूरे करगिल संघर्ष में 15 मई सबसे अहम दिनों में से है। ये वो तारीख थी जब भारतीय सेना के दो जांबाज अफसरों की शौर्य गाथा रची गई। ये थे लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और कैप्टन अमित भारद्वाज।

करगिल संघर्ष

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और कैप्टन अमित भारद्वाज

ऐसे हुई शुरुआत…

इस तारीख को जो कुछ हुआ, उसकी पृष्ठभूमि पहले ही तैयार हो चुकी थी। ये 4 मई 1999 की बात है। बटालिक सेक्टर में हथियारबंद अजनबियों की आमद की भनक सेना को स्थानीय चरवाहों से मिली सूचना से लगी। तब 3 पंजाब रेजिमेंट का एक दल असलियत का पता लगाने के लिए उस दिशा की तरफ गश्त पर निकला और लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया (4 जाट रेजिमेंट) एक दल के साथ काक्सर इलाके में गए। रास्ते में ही ज्यादा बर्फबारी के कारण उन्हें लौटना पड़ गया।

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लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने मम्मी-पापा के साथ (फाइल फोटो)

दस दिन बाद क्या हुआ…

दस दिन बाद यानि 14 मई को 4 पंजाब रेजिमेंट के अफसरों ने इसी सेक्टर की बजरंग चौकी के हालात का जायजा लेने का फैसला लिया। इस चौकी का सामरिक महत्व बहुत है। जायजा लेने के लिए एक जेसीओ (जूनियर अफसर) को कुछ जवानों के साथ जाना था लेकिन एक सच्चे सिपाही के जज्बे से भरपूर सौरभ ने खुद वहां जाने का फैसला लिया। लेफ्टिनेंट सौरभ पांच जवानों भीखा राम, मूला राम, अर्जुन राम, नरेश सिंह और भंवर लाल बागड़िया को साथ लेकर बजरंग पोस्ट की तरफ निकल पड़े। यहां भी जबरदस्त बर्फबारी और खराब मौसम रुकावट बन खड़ा हुआ। गश्त रोकनी पड़ गई। अगले दिन यानि 15 मई को इस दल ने फिर से चौकी की रुख किया। दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे ये दल चौकी के करीब पहुंच चुका था लेकिन इससे पहले कि लेफ्टिनेंट सौरभ और उनके साथी और आगे बढ़ते, चौकी की तरफ से उन पर गोलियों की बौछार शुरू हो गई, ये हमला कोई और नहीं वही घुसपैठिए कर रहे थे जो बजरंग चौकी पर कब्जा जमा चुके थे।

लेफ्टिनेंट कालिया और उनके साथियों ने भी हमले का तगड़ा जवाब दिया लेकिन इस बीच उनका गोला-बारूद खत्म हो गया। और सैन्य मदद उन तक पहुंचती, उससे पहले ही दुश्मन ने उनको घेरकर बंधक बना लिया।

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कैप्टन अमित भारद्वाज अपने मम्मी-पापा के साथ (फाइल फोटो)

…और मदद के लिए कैप्टन अमित भारद्वाज अपने 30 साथियों के साथ निकल पड़े

दूसरी तरफ, इस दल की मदद और दुश्मन से निपटने के लिए कैप्टन अमित भारद्वाज अपने 30 साथियों के साथ निकल चुके थे। इससे पहले कि वो लक्ष्य तक पहुंचते, बीच रास्ते में ही उन पर घुसपैठियों ने अचानक हमला बोल दिया, जो घात लगाकर बैठे थे। आगे बढ़ने के हालात नहीं थे। कुछ साथियों को गोली भी लग चुकी थी। यहां इस जाबांज कैप्टन ने अहम फैसला लिया। कैप्टन अमित ने अपने जूनियर को आदेश दिया कि वो हवलदार राजबीर सिंह को वहीं छोड़कर बाकी साथियों को सुरक्षित निकाल ले जाए क्योंकि दुश्मन का पलड़ा भारी था और ऐसे में कोई नहीं बच पाता। लेकिन इस बीच कैप्टन अमित और हवलदार राजबीर ने दुश्मन का ध्यान बंटाने के लिए मोर्चा संभाले रखा और दुश्मन को तगड़ा जवाब देते रहे। और ये दोनों जाबांज तब तक लड़ते रहे जब तक साथी सुरक्षित तरीके से नहीं निकले और जब तक आखिरी सांस रही। दोनों शहीद हो गए और 57 दिन बाद उनके शव वहां से मिल सके।

कैप्टन अमित भारद्वाज को एक गाना सबसे ज्यादा पसंद था और उस गाने के बोल उनकी शहादत ने सही साबित कर डाले…

IF I DIE IN COMBAT ZONE

BOX ME UP AND SEND ME HOME

PUT MY MEDALS ON MY CHEST

AND TELL MY MOM

I DID MY BEST

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