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किसने कहा- आतंकियों को खिलाउंगा खून की होली ?

मेजर जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो'

मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ एक ऐसा जांबाज, जो गौरेया की ही तरह चपल, चंचल, बहादुर थे और इस चिड़िया की तरह ही वह अपने जीवन में हर जगह अपनी सेवाएं देने के लिए हमेशा तत्पर रहे। उन्होंने 11,000 फीट की ऊंचाई पर पाकिस्तान के खिलाफ भारत को शानदार जीत दिलाई थी। एक दिन में 69 पाकिस्तानी युद्धक टैंकों को ध्वस्त कर सियालकोट में पाकिस्तानी को धूल चटाने वाले मेजर जनरल राजिंदर सिंह को ‘स्पैरो’ यूँ ही नहीं कहा जाता। मेजर जनरल राजिंदर सिंह की फितरत ही कुछ ऐसी थी कि उनकी जांबाजी भरे जीवन ने हर जगह बहादुरी से सफलता का परचम लहराया। उन्होंने दो बार सेना में सेवाएं दीं, दो बार महावीर चक्र प्राप्त किया और दो बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। आइये जानते हैं उनकी जांबाजियों के रोचक किस्से।





  • हॉकी, क्रिकेट व पोलो के भी रहे खिलाड़ी

अमृतसर के खालसा कॉलेज से पढ़े और इसी शहर में पले-बढ़े मेजर जनरल राजिंदर सिंह एक प्रसिद्ध मजीठिया परिवार से ताल्लुक रखते थे। प्यार से उन्हें ‘स्पैरो’ कहा जाता था। 3 अक्टूबर 1932 को वह एक सिपाही के तौर पर भारतीय सेना में भर्ती हुए। ट्रेनिंग के दौरान वह हॉकी, क्रिकेट व पोलो के भी अच्छे खिलाड़ी रहे।

इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) देहरादून से उन्होंने 1 फरवरी 1938 को कमीशन प्राप्त किया। 24 फरवरी 1939 को उन्हें 7वीं लाइट केवेलरी रेजिमेंट में रेजीमेंटल कर्नल नियुक्त किया गया। अगले एक साल उन्होंने उत्तर पश्चिम स्थित ब्रिटिश आर्मी रेजिमेंट ‘किंग्स रेजिमेंट’ (लिवरपूल) में सर्विस की और ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ में भी अपनी सेवाएं दीं। भारत विभाजन के दौरान सितंबर 1947 को उन्हें भारतीय सेना में 7वीं लाइट केवेलरी रेजिमेंट में रेजीमेंटल कर्नल नियुक्त किया गया। 1947 से 1949 तक इस रेजिमेंट की कमान संभाली।

एक स्क्वाड्रन के साथ ये टुकड़ी 1947-48 की लड़ाई के दौरान श्रीनगर भेज दी गई, जहाँ दुश्मन ने शालातेंग में कब्ज़ा जमा लिया था। जम्मू सेक्टर में हालात काफी गंभीर थे और झंगर क्षेत्र पर दुश्मन पूरी तरह कब्ज़ा जमा चुका था। ‘चीता फोर्स’ नाम की इस टुकड़ी ने कांदला क्षेत्र में दुश्मन का बेस नष्ट कर दिया और इस क्षेत्र पर वापस अधिकार कर लिया।

मेजर जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो'

मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ (फाइल फोटो)

11,000 फीट की ऊंचाई पर पहुंचाए टैंक

उधर, उत्तरी क्षेत्र में गिलगित पर दुश्मन कब्ज़ा जमा रहा था। पाकिस्तान ने 11000 फीट की ऊंचाई पर जोज़िला घाटी पर कब्ज़ा कर लिया था। करगिल, द्रास, और जोज़िला घाटी की सुरक्षा भी मेजर के हाथों में थी। सर्दियां आने से पहले जोज़िला पर कब्ज़ा करना जरूरी था। जवान मारे जा रहे थे और हमले असफल हो रहे थे। दुश्मन को वहां से हटाना काफी मुश्किल था। मेजर जनरल के. एस. थिमैया ने मेजर राजविंदर को दुश्मन से लड़ने के लिए घाटी पर टैंक भेजने का आदेश दिया। ये बहुत कठिन काम था, लेकिन रेजिमेंट के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल राजिंदर सिंह ने दुर्गम परिस्थितियों के बावजूद घाटी में अपने टैंकों को पहुंचाने में सफलता पाई। इन टैंकों को दिन में ढक दिया जाता और रात में आगे बढाया जाता था।

मेजर जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो'

1948 में Zozi la पर विजय पाने के बाद मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ (फाइल फोटो)

कहते थे ‘आतंकियों को खून की होली खिलाऊंगा’

20 अक्टूबर को ऑपरेशन शुरू करने का निर्णय लिया गया था। मद्रास सैपर की फील्ड कंपनियां टैंकों को आगे बढ़ाने के लिए बालटाल से जोज़िला तक ट्रैक को सुधारने के लिए दिन-रात काम कर रही थीं। भारी बर्फबरी के कारण ऑपरेशन को 1 नवंबर तक स्थगित करना पड़ा था। वायु सेना की मदद मिल पाना संभव नहीं था।

25 पाउंडर बंदूकों वाली दो रेजिमेंट और 3.7 इंच मोर्टारों की एक रेजिमेंट द्वारा भारी बमबारी के साथ ऑपरेशन की शुरुआत की गई। बर्फ की धुंधलाहट के कारण दुश्मन की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। लगभग 1400 घंटों में लक्ष्य तक पहुंचा गया। टैंकों की उपस्थिति से दुश्मन पूरी तरह भौचक्का रह गया और डरकर भाग गया। उनके एक साथी लेफ्टिनेंट आर.एम. वोहरा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मेजर ‘स्पैरो’ अपनी बातों के पक्के थे। जो ठान लेते थे, उसे करके ही दम लेते। लड़ाई के दौरान वह कहा करते थे कि ”आतंकियों को खून की होली खिलाऊंगा।”

अद्भुत जांबाजी के लिए दो बार मिला महावीर चक्र

ऐसा पहली बार था कि जब 11000 फीट की ऊंचाई पर किसी सेना ने अपने टैंक पहुंचाए हों। उनकी इस जांबाजी से दुश्मन पूरी तरह डर गया और घाटी छोड़कर उलटे पांव भाग गया। इस बहादुरी के लिए मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ को महावीर चक्र प्रदान किया गया।

मेजर जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो'

1948 में Zozila पर जीत हासिल के बाद मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ रेजिमेंट के साथ (फाइल फोटो)

सियालकोट में फिर से रचा इतिहास

1965 में पाकिस्तान की धमक अमृतसर तक पहुँच गई थी और बड़ी संख्या में दुश्मन ने अखनूर पर हमला बोल दिया। दोनों देशों के बीच हुई इस लड़ाई में मेजर जनरल राजिंदर के नेतृत्व में 1 आर्मर्ड डिविजन को सियालकोट, फिल्लोरा और पागिवल सेक्टर की सुरक्षा की जिम्मा सौंपा गया। जबकि इस क्षेत्र में दुश्मन के पास दो आर्मर्ड रेजिमेंट थीं। फिर भी मेजर नहीं डरे और दुश्मन का डटकर मुकाबला किया। एक सितंबर को लड़ाई शुरू हुई। 1 आर्मर्ड डिवीजन ने 15 दिन में पाकिस्तान के 250 टैंकों को नष्ट कर डाला था।

ये युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अभी तक का सबसे बड़ा टैंक युद्ध था। इससे पहले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाइट्स-ब्रिज के प्रसिद्ध युद्ध में जर्मन लेफ्टिनेंट इरविन रोमेल के नेतृत्व में एक दिन में 70 टैंकों को नष्ट किया गया था। 15 दिन की एक छोटी अवधि में लड़े गए इस युद्ध में 1 आर्मर्ड डिवीजन ने एक दिन में 69 पाकिस्तानी टैंक ध्वस्त किए गए, जबकि पूरी लड़ाई में भारतीय सेना के कुल नौ टैंक नष्ट हुए थे। कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर के नेतृत्व में 17 अश्वों के साथ 7वीं लाइट रेजिमेंट को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 16 सितंबर तक फिल्लोरा पर कब्ज़ा कर लिया गया था।

मेजर जनरल राजिंदर सिंह 'स्पैरो'

1965 के सियालकोट युद्ध में जीत हासिल करने के बाद भारतीय सेना (फाइल फोटो)

दो बार चुने गए लोकसभा सदस्य 

मेजर जनरल राजिंदर सिंह ‘स्पैरो’ ने बेहतरीन ढंग से अपने नेतृत्व में दुश्मन के खिलाफ जीत हासिल की और इस बहादुरी और जांबाजी से किए गए नेतृत्व के लिए उन्हें दूसरी बार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। रिटायरमेंट के बाद सितंबर 1966 में राजनीति में शामिल हो गए और पंजाब की अल्पकालिक गुरनाम सिंह सरकार में मंत्री बने। वह 1980 और 1985 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जलंधर से दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। 1994 में उन्होंने 80 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।

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