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मिलिए, भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल और कमांडर-इन-चीफ के एम करिअप्पा से

के-एम-करियप्पा, इंडियन-आर्मी

उनका मिलिटरी करियर लगभग 3 दशक लम्बा था जिसके दौरान 15 जनवरी 1949 में उन्हें सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी वजह से 15 जनवरी 1949 को करिअप्पा ने भारतीय फौज की कमान संभाली थी। फील्ड मार्शल करिअप्पा राजपूत रेजीमेन्ट से थे। फील्ड मार्शल सैम मानेकशा दूसरे ऐसे अधिकारी थे जिन्हें फील्ड मार्शल का रैंक दिया गया था।

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा भारतीय सेना के प्रथम कमांडर-इन-चीफ थे। के एम करिअप्पा ने साल 1947 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। वह भारतीय सेना के उन दो अधिकारियों में शामिल हैं जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गयी। फील्ड मार्शल सैम मानेकशा दूसरे ऐसे अधिकारी थे जिन्हें फील्ड मार्शल का रैंक दिया गया था। उनका मिलिटरी करियर लगभग 3 दशक लम्बा था जिसके दौरान 15 जनवरी 1949 में उन्हें सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी वजह से 15 जनवरी 1949 को करिअप्पा ने भारतीय फौज की कमान संभाली थी। फील्ड मार्शल करिअप्पा राजपूत रेजीमेन्ट से थे। वह साल 1953 में रिटायर हो गए फिर भी किसी न किसी रूप में भारतीय सेना को अपना योगदान देते रहे।





कर्नाटक के कुर्ग में जन्म

फील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी, 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर हुआ था। कुर्ग उस समय एक रियासत थी। उनके पिता कोडंडेरा माडिकेरी में एक राजस्व अधिकारी थे। करिअप्पा के अलावा उनके तीन भाई तथा दो बहनें भी थीं। उन्हें परिवार के सभी सदस्य और रिश्तेदार बचपन में ‘चिम्मा’ कहकर पुकारते थे। करिअप्पा ने 1937 में मुथू मचिया से शादी कर ली जिनसे एक बेटा और एक बेटी हुई। करिअप्पा के बेटे के सी करिअप्पा इंडियन एयरफोर्स में एयर मार्शल के रैंक पर थे। उनके बेटे ने अपने पिता पर एक बायोग्राफी भी लिखी जिसका टाइटल था- ‘फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा’।

फील़्ड-मार्शल-के-एम-करियप्पा, इंडिय-आर्मी

फील्ड मार्शल के एम करियप्पा (फाइल फोटो)

उनकी प्राइमरी शिक्षा माडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में हुई। वह शुरुआत से ही पढ़ाई में काफी तेज थे और गणित, पेंटिंग उनके पसंदीदा विषय थे। जब भी उन्हें खाली वक़्त मिलता वह कैरीकेचर बनाते थे। उनकी स्कूली शिक्षा साल 1917 में पूरी हुई जिसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसी साल उन्होंने चेन्नई के प्रेसीडेंसी कालेज में दाखिला ले लिया। पढ़ाई के साथ-साथ करिअप्पा क्रिकेट, हॉकी और टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी थे। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही उनका सेलेक्शन सेना में अधिकारी के तौर पर हो गया।

सख्त जांच और परीक्षण के बाद…

फर्स्ट वर्ल्ड वार के बाद राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सरकार से भारतीयों को भी सेना में कमीशन देने की मांग की जिसे मान लिया गया। सख्त जांच और परीक्षण के बाद के एम करिअप्पा को उस पहले दल में शामिल कर लिया गया जिसे कठोर प्री-कमीशन प्रशिक्षण दिया जाना था। साल 1919 में वे KCIO (King’s Commissioned Indian Officers) के पहले दल में सम्मिलित किये गए जिन्हें इंदौर के डैली कॉलेज में प्रशिक्षण दिया गया। उसके बाद उन्हें कर्नाटक इन्फेंटरी में बतौर टेम्पररी सेकंड लेफ्टिनेंट कमीशन दिया गया। साल 1921 में उन्हें टेम्पररी लेफ्टिनेंट बना दिया गया और 1922 में उन्हें स्थायी कमीशन दिया गया और वह ‘सेकंड लेफ्टिनेंट’ बनाये गए। फिर करिअप्पा को सन 1923 में लेफ्टिनेंट के पद पर पदोन्नत किया गया।

हजार के बदले हजार सैल्यूट!

साल 1927 में करिअप्पा को कैप्टन के पद पर पदोन्नत कर दिया गया पर इस पदोन्नति को साल 1931 तक सरकारी तौर पर राजपत्रित का दर्जा नहीं दिया गया। इसके बाद उन्होंने डोगरा रेजिमेंट के साथ इराक में अपनी सेवाएं दीं। सन 1933 में क्वेटा के ‘स्टाफ कॉलेज’ में प्रशिक्षण कोर्स करने वाले वह पहले भारतीय अधिकारी बने। 1938 में उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया। उसके अगले साल ही उन्हें स्टाफ कैप्टन बना दिया गया।

ऑफिसर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर

साल 1941-42 में उन्हें इराक, सीरिया और ईरान में तैनात किया गया और सन 1943-44 में उन्होंने अपनी सेवाएं म्यांमार में दीं। साल 1942 में किसी यूनिट का कमांड पाने वाले वह पहले भारतीय अधिकारी बने। 1944 में उन्हें टेम्पररी लेफ्टिनेंट कर्नल बना दिया गया। इसके पश्चात उन्होंने स्वेच्छा से 26वीं डिवीजन को अपनी सेवाएं दीं जो म्यांमार से जापानियों को निकालने में कार्यरत थी। यहां उन्हें ‘ऑफिसर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर’ दिया गया। जुलाई 1946 में उन्हें पूर्ण लेफ्टिनेंट कर्नल का पद दिया गया और उसी साल उन्हें फ्रंटियर ब्रिगेड ग्रुप का ब्रिगेडियर बना दिया गया। साल 1947 में उन्हें ‘इम्पीरियल डिफेन्स कॉलेज’ यूनाइटेड किंगडम, में एक प्रशिक्षण कोर्स के लिए चुना गया। इस कोर्स के लिए चुने जाने वाले वह पहले भारतीय अधिकारी थे। भारत विभाजन के समय उन्हें सेना के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी गयी जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा से पूरा किया।

1949 में करिअप्पा को सेना का प्रमुख चुना

देश की आजादी के बाद करिअप्पा को मेजर जनरल रैंक के साथ ‘डिप्टी चीफ ऑफ़ द जनरल स्टाफ’ नियुक्त किया गया। जब उनकी पदोन्नति लेफ्टिनेंट जनरल के तौर पर हुई तब उन्हें ईस्टर्न आर्मी का कमांडर बना दिया गया। सन 1947 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय उन्हें पश्चिमी कमान का जी-ओ-सी-इन-सी बनाया गया। उनके नेतृत्व में ज़ोजिल्ला, द्रास और कारगिल पर पुनः कब्ज़ा किया गया। कठिन परिस्थितियों में भी के एम करिअप्पा ने जिस स्फूर्ति के साथ अपनी सेना का जिस प्रकार से नेतृत्व किया उसके बाद लगभग उनका अगला कमांडर इन चीफ बनना तय हो गया। 15 जनवरी 1949 को के एम करिअप्पा को भारतीय सेना का प्रमुख चुना गया। इस प्रकार सेना का कमांडर इन चीफ बनने वाले वे पहले भारतीय हो गए।

साल 1953 में वह भारतीय सेना से रिटायर हो गए और उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया जहां उन्होंने 1956 तक अपनी सेवाएं दीं। एक वरिष्ठ अनुभवी अधिकारी के नाते उन्होंने कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी सहायता की। उन्होंने चीन, जापान, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और कई और यूरोपिय देशों की यात्रा की।

अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने उन्हें ‘आर्डर ऑफ़ द चीफ कमांडर ऑफ़ द लीजन ऑफ़ मेरिट’ से सम्मानित किया। देश को दी गयी उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने सन 1986 में उन्हें ‘फील्ड मार्शल’ का पद प्रदान किया।

सेवानिवृत्ति के बाद के.एम.करिअप्पा कर्नाटक के कोडागु जिले के मदिकेरी में बस गए। वह प्रकृति प्रेमी थे और लोगों को पर्यावरण संरक्षण आदि के बारे में भी अवगत कराया। 94 साल की उम्र में करिअप्पा का निधन 15 मई 1993 को बंगलुरू में हुआ।

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